Political Science Chapter 2: Working of Power Sharing | Bihar Board Class 10 Notes
📘 Bihar Board | Class 10 | Political Science
अध्याय 2: सत्ता में साझेदारी की कार्य प्रणाली
Power Sharing & Federalism — सरल Self Study Notes, महत्वपूर्ण तथ्य और परीक्षा अभ्यास
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📖 अध्याय का परिचय
इस अध्याय में सत्ता की साझेदारी, संघीय शासन, विकेंद्रीकरण, पंचायती राज तथा बिहार की नगरीय शासन-व्यवस्था को सरल भाषा में समझाया गया है। साथ ही परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को क्लिक करके उत्तर देखने वाले इंटरैक्टिव प्रारूप में रखा गया है।
अध्ययन तरीका: पहले Notes पढ़ें → महत्वपूर्ण तथ्य दोहराएँ → फिर प्रश्न पर क्लिक करके अपना उत्तर जाँचें।
1लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी की कार्य प्रणाली
लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी की कार्यप्रणाली एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें समाज के हर वर्ग और समुदाय की सरकार तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव को कम करना, सभी के हितों की रक्षा करना और देश में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।
उदाहरण: भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बँटवारा तथा पंचायत और नगर निकायों को अधिकार देना सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली का उदाहरण है।
उदाहरण: भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बँटवारा तथा पंचायत और नगर निकायों को अधिकार देना सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली का उदाहरण है।
सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता:
• लोकतंत्र की नींव मजबूत होती है।
• सभी वर्गों और समुदायों को शासन में भागीदारी का अवसर मिलता है।
• बहुसंख्यकों की मनमानी पर रोक लगती है और अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
• निर्णय प्रक्रिया अधिक संतुलित, पारदर्शी और प्रभावी बनती है।
• समाज में आपसी विश्वास, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता बढ़ती है।
उदाहरण: बेल्जियम में फ्रेंच और डच भाषी समूहों को बराबर हिस्सेदारी देकर सामंजस्य बनाया गया। श्रीलंका में तमिलों की उपेक्षा के कारण गृहयुद्ध और अस्थिरता पैदा हुई।• लोकतंत्र की नींव मजबूत होती है।
• सभी वर्गों और समुदायों को शासन में भागीदारी का अवसर मिलता है।
• बहुसंख्यकों की मनमानी पर रोक लगती है और अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
• निर्णय प्रक्रिया अधिक संतुलित, पारदर्शी और प्रभावी बनती है।
• समाज में आपसी विश्वास, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता बढ़ती है।
2सत्ता की साझेदारी के प्रकार
① क्षैतिज (Horizontal) सत्ता साझेदारी: जब सत्ता का बँटवारा सरकार के विभिन्न अंगों जैसे—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच किया जाता है, तो उसे क्षैतिज सत्ता साझेदारी कहते हैं। इसका उद्देश्य किसी एक अंग को अधिक शक्तिशाली बनने से रोकना है।
उदाहरण: भारत में संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जाँच करती है।
② ऊर्ध्वाधर (Vertical) सत्ता साझेदारी: जब सत्ता का बँटवारा सरकार के विभिन्न स्तरों जैसे—केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच किया जाता है, तो उसे ऊर्ध्वाधर सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: भारत में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पंचायत/नगर निकाय अपने-अपने स्तर पर कार्य करते हैं।
③ सामुदायिक सत्ता साझेदारी: जब विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों या समुदायों को शासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी दी जाती है, तो उसे सामुदायिक सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: बेल्जियम में डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी समुदायों को सरकार में प्रतिनिधित्व दिया गया है।
④ राजनीतिक दलों के बीच साझेदारी: जब विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर सरकार चलाते हैं और निर्णय लेते हैं, तो उसे राजनीतिक दलों के बीच सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: भारत में गठबंधन सरकारें।
⑤ हित समूह और दबाव समूह: हित समूह और दबाव समूह ऐसे संगठन होते हैं, जो सरकार की नीतियों और निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, ताकि अपने वर्ग या समुदाय के हितों की रक्षा कर सकें।
उदाहरण: किसान संगठन, मजदूर संघ और व्यापारिक संगठन सरकार पर अपनी माँगों को मानने के लिए दबाव डालते हैं।
उदाहरण: भारत में संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जाँच करती है।
② ऊर्ध्वाधर (Vertical) सत्ता साझेदारी: जब सत्ता का बँटवारा सरकार के विभिन्न स्तरों जैसे—केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच किया जाता है, तो उसे ऊर्ध्वाधर सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: भारत में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पंचायत/नगर निकाय अपने-अपने स्तर पर कार्य करते हैं।
③ सामुदायिक सत्ता साझेदारी: जब विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों या समुदायों को शासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी दी जाती है, तो उसे सामुदायिक सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: बेल्जियम में डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी समुदायों को सरकार में प्रतिनिधित्व दिया गया है।
④ राजनीतिक दलों के बीच साझेदारी: जब विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर सरकार चलाते हैं और निर्णय लेते हैं, तो उसे राजनीतिक दलों के बीच सत्ता साझेदारी कहते हैं।
उदाहरण: भारत में गठबंधन सरकारें।
⑤ हित समूह और दबाव समूह: हित समूह और दबाव समूह ऐसे संगठन होते हैं, जो सरकार की नीतियों और निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, ताकि अपने वर्ग या समुदाय के हितों की रक्षा कर सकें।
उदाहरण: किसान संगठन, मजदूर संघ और व्यापारिक संगठन सरकार पर अपनी माँगों को मानने के लिए दबाव डालते हैं।
3संघीय शासन व्यवस्था
संघीय शासन व्यवस्था में सत्ता संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच बाँटी जाती है। दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
उदाहरण: भारत में केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे विषयों पर कार्य करती है, जबकि राज्य सरकारें शिक्षा, कृषि और स्वास्थ्य जैसे विषयों का संचालन करती हैं।
उदाहरण: भारत में केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे विषयों पर कार्य करती है, जबकि राज्य सरकारें शिक्षा, कृषि और स्वास्थ्य जैसे विषयों का संचालन करती हैं।
संघीय शासन व्यवस्था की विशेषताएँ:
• संविधान सर्वोच्च होता है।
• केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा होता है।
• दोनों सरकारों को निश्चित अधिकार प्राप्त होते हैं।
• न्यायपालिका विवादों का समाधान करती है।
• इसमें दोहरी शासन व्यवस्था होती है—केंद्र सरकार और राज्य सरकार।
• दोनों सरकारें संविधान के अनुसार कार्य करती हैं।
• संविधान सर्वोच्च होता है।
• केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा होता है।
• दोनों सरकारों को निश्चित अधिकार प्राप्त होते हैं।
• न्यायपालिका विवादों का समाधान करती है।
• इसमें दोहरी शासन व्यवस्था होती है—केंद्र सरकार और राज्य सरकार।
• दोनों सरकारें संविधान के अनुसार कार्य करती हैं।
4एकात्मक शासन व्यवस्था
एकात्मक शासन व्यवस्था में सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित रहती हैं। राज्य या स्थानीय इकाइयाँ केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
उदाहरण: United Kingdom में राजा/रानी सबसे ऊपरी पद होता है, लेकिन वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती हैं। इसलिए प्रधानमंत्री अधिक प्रभावशाली होता है।
उदाहरण: United Kingdom में राजा/रानी सबसे ऊपरी पद होता है, लेकिन वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती हैं। इसलिए प्रधानमंत्री अधिक प्रभावशाली होता है।
मुख्य विशेषताएँ:
• केंद्र सरकार सर्वोच्च होती है।
• राज्यों की शक्तियाँ सीमित होती हैं।
• पूरे देश में एक समान कानून लागू होते हैं।
• प्रशासन में केंद्रीकरण पाया जाता है।
• राज्य सरकारें केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
• केंद्र सरकार सर्वोच्च होती है।
• राज्यों की शक्तियाँ सीमित होती हैं।
• पूरे देश में एक समान कानून लागू होते हैं।
• प्रशासन में केंद्रीकरण पाया जाता है।
• राज्य सरकारें केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
5भारत में संघवाद का विकास
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ भारत को “राज्यों का संघ” घोषित किया गया। भारत में संघीय शासन व्यवस्था अपनाई गई, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया। इसका उद्देश्य देश की एकता बनाए रखते हुए राज्यों को भी अधिकार प्रदान करना था।
शक्तियों का विभाजन — सातवीं अनुसूची
① संघ सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। उदाहरण: रक्षा, विदेश नीति, रेल।
② राज्य सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। उदाहरण: पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य।
③ समवर्ती सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास होता है। उदाहरण: शिक्षा, वन, विवाह।
④ अवशिष्ट विषय: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है। उदाहरण: साइबर अपराध, अंतरिक्ष।
शक्तियों का विभाजन — सातवीं अनुसूची
① संघ सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। उदाहरण: रक्षा, विदेश नीति, रेल।
② राज्य सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। उदाहरण: पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य।
③ समवर्ती सूची: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास होता है। उदाहरण: शिक्षा, वन, विवाह।
④ अवशिष्ट विषय: इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है। उदाहरण: साइबर अपराध, अंतरिक्ष।
भारत में संघवाद की चुनौतियाँ:
• केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद होना।
• आर्थिक संसाधनों का समान रूप से वितरण न होना।
• क्षेत्रवाद और भाषावाद के कारण मतभेद बढ़ना।
• राज्यों द्वारा अधिक अधिकार और स्वतंत्रता की माँग करना।
• कई बार केंद्र सरकार का राज्यों के कार्यों में हस्तक्षेप करना।
समाधान: केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, सभी भाषाओं और क्षेत्रों को समान सम्मान, राज्यों को उचित अधिकार तथा न्यायपालिका और बातचीत के माध्यम से विवादों का समाधान।
• केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद होना।
• आर्थिक संसाधनों का समान रूप से वितरण न होना।
• क्षेत्रवाद और भाषावाद के कारण मतभेद बढ़ना।
• राज्यों द्वारा अधिक अधिकार और स्वतंत्रता की माँग करना।
• कई बार केंद्र सरकार का राज्यों के कार्यों में हस्तक्षेप करना।
समाधान: केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, सभी भाषाओं और क्षेत्रों को समान सम्मान, राज्यों को उचित अधिकार तथा न्यायपालिका और बातचीत के माध्यम से विवादों का समाधान।
6भारत में विकेंद्रीकरण
विकेंद्रीकरण वह व्यवस्था है, जिसमें सरकार अपनी कुछ शक्तियाँ और कार्य स्थानीय संस्थाओं जैसे पंचायतों और नगर निकायों को सौंप देती है, ताकि प्रशासन जनता के अधिक निकट पहुँच सके।
उदाहरण: भारत में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और नगर निगम को स्थानीय स्तर पर विकास कार्य करने के अधिकार दिए गए हैं।
उदाहरण: भारत में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और नगर निगम को स्थानीय स्तर पर विकास कार्य करने के अधिकार दिए गए हैं।
7बिहार में पंचायती राज व्यवस्था
बिहार में स्वशासन की परंपरा: बिहार में स्वशासन की परंपरा बहुत पुरानी है। वैशाली का लिच्छवी गणतंत्र लोकतांत्रिक शासन का प्रमुख उदाहरण था। वैदिक काल में सभा और समिति जैसी संस्थाएँ कार्य करती थीं। महात्मा गाँधी ने गाँवों को भारत की आत्मा कहा था।
संविधान में पंचायती राज: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें स्वायत्त शासन की इकाई बनाने का निर्देश दिया गया है। राज्य सरकारों को पंचायतों को शक्तियाँ और अधिकार देने का दायित्व सौंपा गया।
पंचायती राज की शुरुआत: बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसाओं पर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था शुरू हुई। बाद में अन्य राज्यों में भी इसे लागू किया गया।
बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें: त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था—ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद।
संविधान में पंचायती राज: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें स्वायत्त शासन की इकाई बनाने का निर्देश दिया गया है। राज्य सरकारों को पंचायतों को शक्तियाँ और अधिकार देने का दायित्व सौंपा गया।
पंचायती राज की शुरुआत: बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसाओं पर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था शुरू हुई। बाद में अन्य राज्यों में भी इसे लागू किया गया।
बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें: त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था—ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद।
873वाँ संविधान संशोधन
1992 में 73वाँ संविधान संशोधन पारित किया गया। इसके द्वारा संविधान के भाग-9 में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया। ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों के 29 विषय शामिल किए गए।
बिहार में पंचायती राज का स्वरूप: बिहार में पंचायती राज व्यवस्था त्रिस्तरीय है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
तीन स्तर: (क) ग्राम पंचायत, (ख) पंचायत समिति, (ग) जिला परिषद।
बिहार में पंचायती राज का स्वरूप: बिहार में पंचायती राज व्यवस्था त्रिस्तरीय है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
तीन स्तर: (क) ग्राम पंचायत, (ख) पंचायत समिति, (ग) जिला परिषद।
9ग्राम पंचायत
ग्राम पंचायत पंचायती राज व्यवस्था का सबसे निचला स्तर है। बिहार सरकार लगभग 7000 की औसत आबादी पर एक ग्राम पंचायत का गठन करती है। पंचायत क्षेत्र को लगभग 500 की आबादी के आधार पर वार्डों में बाँटा जाता है। प्रत्येक वार्ड से एक वार्ड सदस्य चुना जाता है।
ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होता है तथा उसकी सहायता के लिए उपमुखिया होता है। पंचायत के प्रशासनिक कार्यों के लिए पंचायत सेवक नियुक्त किया जाता है, जो सचिव का कार्य करता है।
आरक्षण व्यवस्था: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया है।
मुख्य कार्य: वार्षिक योजना और बजट तैयार करना, प्राकृतिक आपदा में सहायता, सार्वजनिक संपत्ति से अतिक्रमण हटाना और सामुदायिक कार्यों में लोगों का सहयोग प्राप्त करना।
शक्तियाँ: संपत्ति अर्जित और प्रबंधित करना, विभिन्न कर लगाना तथा राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त करना।
आय के स्रोत: होल्डिंग कर, व्यवसाय कर, व्यापार और पेशा कर; वाहनों के निबंधन शुल्क, हाट-मेला आदि से शुल्क तथा सरकारी अनुदान।
ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होता है तथा उसकी सहायता के लिए उपमुखिया होता है। पंचायत के प्रशासनिक कार्यों के लिए पंचायत सेवक नियुक्त किया जाता है, जो सचिव का कार्य करता है।
आरक्षण व्यवस्था: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया है।
मुख्य कार्य: वार्षिक योजना और बजट तैयार करना, प्राकृतिक आपदा में सहायता, सार्वजनिक संपत्ति से अतिक्रमण हटाना और सामुदायिक कार्यों में लोगों का सहयोग प्राप्त करना।
शक्तियाँ: संपत्ति अर्जित और प्रबंधित करना, विभिन्न कर लगाना तथा राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त करना।
आय के स्रोत: होल्डिंग कर, व्यवसाय कर, व्यापार और पेशा कर; वाहनों के निबंधन शुल्क, हाट-मेला आदि से शुल्क तथा सरकारी अनुदान।
10ग्राम पंचायत के प्रमुख अंग
① ग्रामसभा: ग्राम पंचायत की व्यवस्थापिका सभा। पंचायत क्षेत्र के सभी 18 वर्ष से अधिक आयु के स्त्री-पुरुष इसके सदस्य होते हैं। ग्रामसभा की बैठक वर्ष में कम-से-कम चार बार होती है। इसकी बैठक मुखिया बुलाता है और अध्यक्षता करता है।
② ग्राम रक्षादल: गाँव की सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित संस्था। इसमें 18 से 30 वर्ष आयु के युवक शामिल हो सकते हैं। इसका प्रमुख दलपति कहलाता है।
③ ग्राम कचहरी: ग्राम पंचायत की न्यायिक संस्था। बिहार में पंचायत की कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग रखा गया है। इसका प्रमुख सरपंच होता है। प्रत्येक 500 की आबादी पर पंच चुने जाते हैं और इनका कार्यकाल 5 वर्ष होता है। ग्राम कचहरी को दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। सरपंच अधिकतम 10,000 रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकता है।
सहायक अधिकारी: न्याय मित्र सरपंच की सहायता करता है और न्याय सचिव अभिलेख व कागजातों का रख-रखाव करता है।
② ग्राम रक्षादल: गाँव की सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित संस्था। इसमें 18 से 30 वर्ष आयु के युवक शामिल हो सकते हैं। इसका प्रमुख दलपति कहलाता है।
③ ग्राम कचहरी: ग्राम पंचायत की न्यायिक संस्था। बिहार में पंचायत की कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग रखा गया है। इसका प्रमुख सरपंच होता है। प्रत्येक 500 की आबादी पर पंच चुने जाते हैं और इनका कार्यकाल 5 वर्ष होता है। ग्राम कचहरी को दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। सरपंच अधिकतम 10,000 रुपये तक के मामलों की सुनवाई कर सकता है।
सहायक अधिकारी: न्याय मित्र सरपंच की सहायता करता है और न्याय सचिव अभिलेख व कागजातों का रख-रखाव करता है।
11पंचायत समिति
पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था का दूसरा या मध्य स्तर है। यह ग्राम पंचायत और जिला परिषद के बीच की कड़ी का कार्य करती है। बिहार में लगभग 5000 की आबादी पर पंचायत समिति के एक सदस्य के चुनाव का प्रावधान है।
पंचायत समिति के प्रमुख और उपप्रमुख का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। प्रमुख समिति की बैठक बुलाता है, अध्यक्षता करता है और कार्यों की देखरेख करता है।
प्रमुख के कार्य: बैठक बुलाना और अध्यक्षता करना, कार्यों की जाँच-पड़ताल करना, प्रखंड विकास पदाधिकारी पर नियंत्रण रखना तथा योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी करना।
प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO): पंचायत समिति का पदेन सचिव। वह निर्णय लागू करता है, कोष से धन खर्च करता है, पंचायतों का निरीक्षण करता है और विकास कार्यों का संचालन करता है।
पंचायत समिति के कार्य: ग्राम पंचायतों की वार्षिक योजनाओं पर विचार करना, समेकित योजना जिला परिषद को भेजना, सामुदायिक विकास कार्यक्रम और प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य करना।
पंचायत समिति के प्रमुख और उपप्रमुख का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। प्रमुख समिति की बैठक बुलाता है, अध्यक्षता करता है और कार्यों की देखरेख करता है।
प्रमुख के कार्य: बैठक बुलाना और अध्यक्षता करना, कार्यों की जाँच-पड़ताल करना, प्रखंड विकास पदाधिकारी पर नियंत्रण रखना तथा योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी करना।
प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO): पंचायत समिति का पदेन सचिव। वह निर्णय लागू करता है, कोष से धन खर्च करता है, पंचायतों का निरीक्षण करता है और विकास कार्यों का संचालन करता है।
पंचायत समिति के कार्य: ग्राम पंचायतों की वार्षिक योजनाओं पर विचार करना, समेकित योजना जिला परिषद को भेजना, सामुदायिक विकास कार्यक्रम और प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य करना।
12जिला परिषद
जिला परिषद पंचायती राज व्यवस्था का तीसरा और सर्वोच्च स्तर है। यह जिला स्तर पर कार्य करती है तथा जिले की सभी पंचायत समितियाँ इसके अंतर्गत आती हैं। बिहार में लगभग 50,000 की आबादी पर जिला परिषद का एक सदस्य चुना जाता है।
जिला परिषद में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है। बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया है।
गठन: कार्यकाल 5 वर्ष होता है। जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रमुख इसके सदस्य होते हैं। जिला परिषद में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते हैं, जिनका चुनाव सदस्य अपने बीच से करते हैं।
कार्य: जिले के विकास कार्यों की योजना बनाना, पंचायत समितियों के कार्यों का समन्वय करना, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की निगरानी करना और राज्य सरकार द्वारा सौंपे गए कार्यों को पूरा करना।
जिला परिषद में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है। बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया है।
गठन: कार्यकाल 5 वर्ष होता है। जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रमुख इसके सदस्य होते हैं। जिला परिषद में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते हैं, जिनका चुनाव सदस्य अपने बीच से करते हैं।
कार्य: जिले के विकास कार्यों की योजना बनाना, पंचायत समितियों के कार्यों का समन्वय करना, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की निगरानी करना और राज्य सरकार द्वारा सौंपे गए कार्यों को पूरा करना।
13राज्य वित्त आयोग
पंचायतों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष पर राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाता है। यह आयोग पंचायतों को आर्थिक सहायता और अनुदान संबंधी सुझाव देता है।
14पंचायत चुनाव और निर्वाचन आयोग
पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। इन्हें मनमाने ढंग से भंग नहीं किया जा सकता। यदि पंचायत भंग हो जाए, तो 6 माह के अंदर चुनाव कराना आवश्यक है। पंचायत चुनावों के संचालन और नियंत्रण का कार्य राज्य निर्वाचन आयोग करता है। राज्य निर्वाचन आयोग की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
15बिहार में नगरीय शासन-व्यवस्था
बिहार में नगरीय शासन-व्यवस्था शहरों और कस्बों के प्रशासन तथा विकास के लिए बनाई गई स्थानीय स्वशासन व्यवस्था है। यूनानी विद्वान मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का वर्णन किया है। चाणक्य की अर्थशास्त्र में भी नगर प्रशासन का उल्लेख मिलता है।
भारतीय संविधान के 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा नगरीय शासन को संवैधानिक मान्यता दी गई। यह 1 जून 1993 से लागू हुआ। नगरीय निकायों के कार्यों का उल्लेख संविधान की 12वीं अनुसूची में किया गया है।
बिहार में तीन प्रमुख संस्थाएँ: नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम।
भारतीय संविधान के 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा नगरीय शासन को संवैधानिक मान्यता दी गई। यह 1 जून 1993 से लागू हुआ। नगरीय निकायों के कार्यों का उल्लेख संविधान की 12वीं अनुसूची में किया गया है।
बिहार में तीन प्रमुख संस्थाएँ: नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम।
16नगर पंचायत
नगर पंचायत ऐसे क्षेत्रों में बनाई जाती है जो गाँव से शहर का रूप ले रहे होते हैं। सामान्यतः 12,000 से 40,000 जनसंख्या वाले क्षेत्रों में नगर पंचायत का गठन किया जाता है।
सदस्यों का चुनाव वार्डों से प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। वार्डों से चुने गए सदस्यों को वार्ड पार्षद कहा जाता है। कुछ सदस्यों का मनोनयन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। सदस्यों की संख्या सामान्यतः 10 से 37 तक होती है। कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष होते हैं।
कार्य: सफाई व्यवस्था, सड़क और प्रकाश, पेयजल तथा स्थानीय विकास कार्य।
सदस्यों का चुनाव वार्डों से प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। वार्डों से चुने गए सदस्यों को वार्ड पार्षद कहा जाता है। कुछ सदस्यों का मनोनयन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। सदस्यों की संख्या सामान्यतः 10 से 37 तक होती है। कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष होते हैं।
कार्य: सफाई व्यवस्था, सड़क और प्रकाश, पेयजल तथा स्थानीय विकास कार्य।
17नगर परिषद
नगर पंचायत से बड़े शहरों में नगर परिषद का गठन किया जाता है। सामान्यतः 2 लाख से 3 लाख तक की जनसंख्या वाले शहरों में नगर परिषद बनाई जाती है।
प्रमुख अंग: नगर पर्षद, समितियाँ, अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा कार्यपालक पदाधिकारी।
पार्षद वार्डों से चुने जाते हैं। सदस्य संख्या 10 से 40 तक होती है और कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। नगर पर्षद की बैठक प्रत्येक महीने होती है।
समितियाँ: शिक्षा समिति, स्वास्थ्य समिति, वित्त समिति और अस्पताल समिति।
कार्यपालक पदाधिकारी: राज्य सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, जो नगर परिषद के निर्णयों को लागू करता है।
अनिवार्य कार्य: सफाई, रोशनी, पेयजल, सड़क-नाली निर्माण एवं मरम्मत, प्राथमिक शिक्षा, अस्पताल-स्वास्थ्य सेवाएँ तथा जन्म-मृत्यु पंजीकरण।
ऐच्छिक कार्य: पार्क, पुस्तकालय, वाचनालय, गरीबों के लिए आवास तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम।
आय: मकान कर, जल कर, रोशनी कर, नाली कर, बाजार कर, मनोरंजन कर, चुंगी कर और राज्य सरकार से अनुदान।
प्रमुख अंग: नगर पर्षद, समितियाँ, अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा कार्यपालक पदाधिकारी।
पार्षद वार्डों से चुने जाते हैं। सदस्य संख्या 10 से 40 तक होती है और कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। नगर पर्षद की बैठक प्रत्येक महीने होती है।
समितियाँ: शिक्षा समिति, स्वास्थ्य समिति, वित्त समिति और अस्पताल समिति।
कार्यपालक पदाधिकारी: राज्य सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, जो नगर परिषद के निर्णयों को लागू करता है।
अनिवार्य कार्य: सफाई, रोशनी, पेयजल, सड़क-नाली निर्माण एवं मरम्मत, प्राथमिक शिक्षा, अस्पताल-स्वास्थ्य सेवाएँ तथा जन्म-मृत्यु पंजीकरण।
ऐच्छिक कार्य: पार्क, पुस्तकालय, वाचनालय, गरीबों के लिए आवास तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम।
आय: मकान कर, जल कर, रोशनी कर, नाली कर, बाजार कर, मनोरंजन कर, चुंगी कर और राज्य सरकार से अनुदान।
18नगर निगम
बड़े शहरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है। सामान्यतः 3 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में नगर निगम बनाया जाता है।
भारत में पहला नगर निगम 1688 ई. में मद्रास (चेन्नई) में स्थापित हुआ था। बिहार में पहला नगर निगम 1952 में पटना में स्थापित किया गया।
नगर निगम क्षेत्र को वार्डों में बाँटा जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाता है। बिहार में महिलाओं को 50% आरक्षण प्राप्त है।
प्रमुख अंग: निगम परिषद, सशक्त स्थायी समिति, परामर्शदात्री समितियाँ और नगर आयुक्त।
महापौर एवं उपमहापौर: निगम परिषद अपने बीच से चुनाव करती है। महापौर नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है।
नगर आयुक्त: बिहार सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य प्रशासक, जो निगम परिषद के निर्णयों को लागू करता है।
कार्य: सफाई और स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क-पुल-नाली, अस्पताल और विद्यालय, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, अग्निशमन सेवा तथा पार्क-पुस्तकालय आदि।
आय: मकान कर, जल कर, शौचालय कर, वाहन कर, बाजार शुल्क और राज्य सरकार से अनुदान।
भारत में पहला नगर निगम 1688 ई. में मद्रास (चेन्नई) में स्थापित हुआ था। बिहार में पहला नगर निगम 1952 में पटना में स्थापित किया गया।
नगर निगम क्षेत्र को वार्डों में बाँटा जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाता है। बिहार में महिलाओं को 50% आरक्षण प्राप्त है।
प्रमुख अंग: निगम परिषद, सशक्त स्थायी समिति, परामर्शदात्री समितियाँ और नगर आयुक्त।
महापौर एवं उपमहापौर: निगम परिषद अपने बीच से चुनाव करती है। महापौर नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है।
नगर आयुक्त: बिहार सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य प्रशासक, जो निगम परिषद के निर्णयों को लागू करता है।
कार्य: सफाई और स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क-पुल-नाली, अस्पताल और विद्यालय, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, अग्निशमन सेवा तथा पार्क-पुस्तकालय आदि।
आय: मकान कर, जल कर, शौचालय कर, वाहन कर, बाजार शुल्क और राज्य सरकार से अनुदान।
📌 परीक्षा सारांश
- सत्ता की साझेदारी का उद्देश्य सभी वर्गों और समुदायों की शासन में भागीदारी सुनिश्चित करना है।
- क्षैतिज सत्ता साझेदारी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच होती है।
- ऊर्ध्वाधर सत्ता साझेदारी केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच होती है।
- सामुदायिक सत्ता साझेदारी में विभिन्न समुदायों को शासन में प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
- संघीय शासन व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन होता है।
- भारत को संविधान में “राज्यों का संघ” कहा गया है।
- सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची का उल्लेख है।
- अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है।
- विकेंद्रीकरण से स्थानीय संस्थाओं को शासन में अधिक अधिकार मिलते हैं।
- 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- पंचायती राज के तीन स्तर ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद हैं।
- बिहार में महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में 50% आरक्षण दिया गया है।
- ग्राम पंचायत का प्रमुख मुखिया और ग्राम कचहरी का प्रमुख सरपंच होता है।
- पंचायत चुनावों का संचालन राज्य निर्वाचन आयोग करता है।
- 74वें संविधान संशोधन द्वारा नगरीय निकायों को संवैधानिक मान्यता दी गई।
- बिहार में नगरीय शासन की प्रमुख संस्थाएँ नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम हैं।
- महापौर नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है और नगर आयुक्त मुख्य प्रशासक होता है।
- स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र को जनता के अधिक निकट लाता है।
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कुल 20 प्रश्न
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1संघ राज्य की विशेषता नहीं है।
(क) लिखित संविधान (ख) शक्तियों का विभाजन
(ग) इकहरी शासन-व्यवस्था (घ) सर्वोच्च न्यायपालिका▼
(क) लिखित संविधान (ख) शक्तियों का विभाजन
(ग) इकहरी शासन-व्यवस्था (घ) सर्वोच्च न्यायपालिका▼
उत्तर: सही उत्तर: (ग) इकहरी शासन-व्यवस्था।
2संघ सरकार का उदाहरण है—
(क) अमेरिका (ख) चीन
(ग) ब्रिटेन (घ) इनमें से कोई नहीं▼
(क) अमेरिका (ख) चीन
(ग) ब्रिटेन (घ) इनमें से कोई नहीं▼
उत्तर: सही उत्तर: (क) अमेरिका।
3भारत में संघ एवं राज्यों के बीच अधिकारों का विभाजन कितनी सूचियों में हुआ है?
(क) संघीय सूची, राज्य सूची
(ख) संघीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची▼
(क) संघीय सूची, राज्य सूची
(ख) संघीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची▼
उत्तर: सही उत्तर: तीन सूचियाँ—संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।
4सत्ता में साझेदारी सही है क्योंकि—
(क) यह विविधता को अपने में समेट लेती है
(ख) देश को एकता में बाँधकर रखती है
(ग) फैसले लेने में देरी कराती है
(घ) विभिन्न समुदायों के बीच टकराव कम करती है▼
(क) यह विविधता को अपने में समेट लेती है
(ख) देश को एकता में बाँधकर रखती है
(ग) फैसले लेने में देरी कराती है
(घ) विभिन्न समुदायों के बीच टकराव कम करती है▼
उत्तर: सही उत्तर: (क), (ख) और (घ)। सत्ता की साझेदारी विविधता को समायोजित करती है, एकता को मजबूत करती है और विभिन्न समुदायों के बीच टकराव कम कर सकती है।
5संघवाद लोकतंत्र के अनुकूल है।
(क) संघीय व्यवस्था केन्द्र सरकार की शक्ति को सीमित करती है।
(ख) संघवाद इस बात की व्यवस्था करता है कि उस शासन-व्यवस्था के अंतर्गत रहनेवाले लोगों में आपसी सौहार्द एवं विश्वास बना रहे कि एक की भाषा, संस्कृति और धर्म दूसरे पर लाद दी जाएगी।▼
(क) संघीय व्यवस्था केन्द्र सरकार की शक्ति को सीमित करती है।
(ख) संघवाद इस बात की व्यवस्था करता है कि उस शासन-व्यवस्था के अंतर्गत रहनेवाले लोगों में आपसी सौहार्द एवं विश्वास बना रहे कि एक की भाषा, संस्कृति और धर्म दूसरे पर लाद दी जाएगी।▼
उत्तर: सही उत्तर: (क) और (ख)। संघवाद सत्ता के केंद्रीकरण को सीमित करता है और विभिन्न क्षेत्रों तथा समुदायों के हितों के समायोजन में सहायता करता है।
6सरकार स्थानीय लोगों को शामिल कर अपनी योजनाएँ कम खर्च में भी कर सकती है?▼
उत्तर: वरीयता के क्रम में: स्थानीय लोगों की भागीदारी वाला तर्क अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थानीय लोगों को शामिल करने से योजनाएँ स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बन सकती हैं।
7स्थानीय लोग अपने इलाके की जरूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं।▼
उत्तर: यह स्थानीय स्वशासन के पक्ष में महत्वपूर्ण तर्क है; स्थानीय लोग अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और समस्याओं से अधिक परिचित होते हैं।
8आम जनता के लिए अपने प्रदेश के अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।▼
उत्तर: यह स्थानीय स्वशासन के पक्ष में तर्क है, क्योंकि स्थानीय संस्थाएँ जनता के अधिक निकट होती हैं और उनसे संपर्क करना अपेक्षाकृत आसान होता है।
9स्थानीय जनता द्वारा बनाई योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बनाई योजना में ज्यादा स्वीकृत होती है।▼
उत्तर: यह भी स्थानीय स्वशासन के पक्ष में तर्क है, क्योंकि स्थानीय भागीदारी से योजनाओं में जनता की आवश्यकताओं और स्वीकृति को बेहतर ढंग से शामिल किया जा सकता है।
10संघ राज्य का अर्थ बताएँ।▼
उत्तर: संघ राज्य वह शासन व्यवस्था है जिसमें संविधान के द्वारा सत्ता केंद्र और राज्यों के बीच बाँटी जाती है तथा दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करती हैं।
11संघीय शासन की दो विशेषताएँ बताएँ।▼
उत्तर: संघीय शासन की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं—(1) केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन, और (2) दोनों स्तर की सरकारों का अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य करना।
लघु उत्तरीय प्रश्न
12सत्ता की साझेदारी से आप क्या समझते हैं?▼
उत्तर: सत्ता की साझेदारी का अर्थ है शासन की शक्ति को विभिन्न संस्थाओं, सरकार के स्तरों, सामाजिक समूहों तथा राजनीतिक दलों के बीच बाँटना, ताकि किसी एक व्यक्ति या संस्था के हाथ में सारी शक्ति केंद्रित न हो।
13सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्व रखती है?▼
उत्तर: सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र को मजबूत और समावेशी बनाती है। इससे विभिन्न वर्गों और समुदायों को शासन में भागीदारी मिलती है, बहुसंख्यक की मनमानी पर रोक लगती है और सामाजिक टकराव कम करने में सहायता मिलती है।
14सत्ता की साझेदारी के अलग-अलग तरीके क्या हैं?▼
उत्तर: सत्ता की साझेदारी के प्रमुख तरीके हैं—क्षैतिज साझेदारी (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका), ऊर्ध्वाधर साझेदारी (केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकार), सामुदायिक साझेदारी, राजनीतिक दलों के बीच साझेदारी तथा हित और दबाव समूहों के माध्यम से प्रभाव।
15हर समाज में सत्ता की साझेदारी की जरूरत होती है, भले ही वह छोटा हो या उसमें सामाजिक विभाजन नहीं हो।▼
उत्तर: सत्ता की साझेदारी केवल सामाजिक विभाजन वाले बड़े समाजों के लिए ही आवश्यक नहीं है। इससे निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न लोगों की भागीदारी बढ़ती है, शक्ति के केंद्रीकरण पर रोक लगती है और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व तथा विश्वास मजबूत होता है।
16सत्ता की साझेदारी की जरूरत क्षेत्रीय विभाजन वाले बड़े देशों में होती है।▼
उत्तर: बड़े और क्षेत्रीय विविधता वाले देशों में अलग-अलग क्षेत्रों की आवश्यकताएँ और हित हो सकते हैं। सत्ता का बँटवारा क्षेत्रीय सरकारों को अपने विषयों पर निर्णय लेने का अवसर देता है और इससे राष्ट्रीय एकता के साथ क्षेत्रीय हितों का समायोजन संभव होता है।
17सत्ता की साझेदारी की जरूरत क्षेत्रीय, भाषायी, जातीय आधार पर विभाजन वाले समाज में ही होती है।▼
उत्तर: ऐसे समाजों में सत्ता की साझेदारी विभिन्न समूहों को प्रतिनिधित्व देकर उनकी पहचान और हितों का सम्मान करती है। इससे किसी एक समूह के प्रभुत्व की संभावना घटती है, आपसी विश्वास बढ़ता है और सामाजिक विविधता को लोकतांत्रिक तरीके से समायोजित किया जा सकता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
18राजनीतिक दल किस तरह से सत्ता में साझेदारी करते हैं?▼
उत्तर: राजनीतिक दल चुनावों के माध्यम से सत्ता प्राप्त करते हैं और कई बार अलग-अलग दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं। गठबंधन में शामिल दल मंत्रिमंडल, नीतियों और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इस प्रकार सत्ता विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच साझा होती है।
19गठबंधन की सरकारों में सत्ता में साझेदारी कौन-कौन होते हैं?▼
उत्तर: गठबंधन सरकार में दो या अधिक राजनीतिक दल सत्ता में साझेदारी करते हैं। वे आपसी समझौते के आधार पर सरकार बनाते हैं और मंत्रिमंडल तथा नीति-निर्णय में भागीदारी करते हैं।
20दबाव समूह किस तरह से सरकार को प्रभावित कर सत्ता में साझेदार बनते हैं?▼
उत्तर: दबाव समूह स्वयं सरकार बनाने का प्रयास किए बिना अपनी माँगों और हितों के लिए सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं। किसान संगठन, मजदूर संघ और व्यापारिक संगठन ज्ञापन, वार्ता, जनमत और अन्य लोकतांत्रिक तरीकों से सरकार पर अपनी माँगों के लिए दबाव डाल सकते हैं।
🔄 एक नजर में अध्याय का पुनरावर्तन
सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में शक्ति के केंद्रीकरण को रोकती है। संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन करता है। विकेंद्रीकरण स्थानीय संस्थाओं को अधिकार देकर शासन को जनता के निकट लाता है। बिहार में पंचायती राज और नगरीय निकाय स्थानीय स्वशासन के महत्वपूर्ण आधार हैं।
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