कक्षा 10
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Political Science Chapter 1: Power Sharing | Bihar Board Class 10 Notes

📘 Bihar Board  |  Class 10  |  Political Science

अध्याय 1: सत्ता की साझेदारी

Power Sharing — सरल Self Study Notes, महत्वपूर्ण तथ्य और परीक्षा अभ्यास
📖 आसान भाषा🎯 परीक्षा उपयोगी📝 22 प्रश्न💡 क्लिक करके उत्तर देखें

📖 अध्याय का परिचय

इस अध्याय में सत्ता की साझेदारी, सामाजिक विभेद, सामाजिक विभाजन तथा लोकतंत्र में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को समझाया गया है। लोकतंत्र में विविधता को स्वीकार करते हुए संवाद, सहमति और शांतिपूर्ण तरीके से विभिन्न समूहों के हितों को समायोजित करना महत्वपूर्ण है।

परीक्षा रणनीति: पहले नीचे दिए गए नोट्स पढ़ें, फिर अभ्यास के प्रश्नों पर क्लिक करके अपने उत्तर की जाँच करें।

1लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी का अर्थ

सत्ता की साझेदारी का मतलब है कि शासन करने की शक्ति केवल एक व्यक्ति या संस्था के पास न होकर विभिन्न संस्थाओं, स्तरों और समूहों में बाँटी जाती है। इसका उद्देश्य लोकतंत्र को न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रभावी बनाना है। इससे सभी को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिलता है तथा किसी एक वर्ग, संस्था या व्यक्ति के हाथ में अत्यधिक शक्ति केंद्रित नहीं होती।

उदाहरण: भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन सत्ता की साझेदारी का अच्छा उदाहरण है।

2लोकतंत्र में द्वंद्ववाद

द्वंद्ववाद का अर्थ विभिन्न विचारों, मतों और हितों के बीच टकराव है। लोकतंत्र में विविधता के कारण मतभेद स्वाभाविक हैं। यदि इन्हें संवाद और समझौते से सुलझाया जाए तो लोकतंत्र मजबूत होता है, लेकिन हिंसा होने पर अस्थिरता पैदा हो सकती है।

उदाहरण: बेल्जियम में फ्रेंच और डच भाषा-भाषी समुदायों के बीच मतभेद थे, जिन्हें सत्ता की साझेदारी के प्रावधानों द्वारा सुलझाया गया।

3सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति

समाज में विभेद भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के कारण उत्पन्न होते हैं। जन्म से जुड़ी पहचान सामाजिक विभेद का प्रमुख कारण है। लिंग, रंग, नस्ल, धन, शक्ति और गरीबी जैसे कारण भी सामाजिक विभेद पैदा करते हैं। धर्म परिवर्तन, अंतरजातीय विवाह, अलग पेशे और शिक्षा से भी नई पहचान बन सकती है।

उदाहरण: श्रीलंका में सिंहली और तमिल समुदायों के बीच भाषा और जातीय पहचान के कारण लंबे समय तक संघर्ष रहा।

4सामाजिक विभेद और सामाजिक विभाजन में अंतर

सामाजिक विभेद: समाज में मौजूद विभिन्नता, जैसे जाति, धर्म और भाषा।

सामाजिक विभाजन: जब सामाजिक विभिन्नता टकराव, अन्याय या संघर्ष का रूप ले लेती है।

उदाहरण: महाराष्ट्र और असम में उत्तर भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार सामाजिक विभाजन का उदाहरण है।

5विभेदों में तालमेल और संघर्ष

लोकतंत्र की विशेषता विविधता में एकता है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं। नीदरलैंड में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक समूहों के बीच भी आपसी सौहार्द देखने को मिलता है।

जब सामाजिक विभेद सीमा से बाहर हो जाते हैं, तो सामाजिक विभाजन और संघर्ष बढ़ सकता है।

6सामाजिक विभेदों की राजनीति पर प्रभाव

सामाजिक विभेद जब राजनीति में प्रवेश करते हैं तो उनके परिणाम सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकते हैं। यदि राजनीतिक दल विभेदों को भड़काकर सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, तो सांप्रदायिकता, जातिवाद और हिंसा बढ़ सकती है। इससे अविश्वास, असमानता और तनाव पैदा होता है।

दूसरी ओर, यदि सामाजिक विभेदों का उपयोग समानता, न्याय और प्रतिनिधित्व के लिए किया जाए तो लोकतंत्र मजबूत होता है।

उदाहरण: भारत में आरक्षण नीति सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देती है, जबकि सांप्रदायिक राजनीति सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है।

7सामाजिक विभेद के तीन निर्धारक तत्व

① जाति (Caste): जाति व्यवस्था भारतीय समाज में महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व है। यह जन्म से तय होती है और व्यक्ति के सामाजिक स्तर, पेशे तथा प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है।
उदाहरण: सवर्ण और दलित के बीच सामाजिक अंतर जाति-आधारित विभेद को दर्शाता है।

② धर्म (Religion): विभिन्न धर्मों की आस्थाओं, परंपराओं और प्रथाओं में अंतर से सामाजिक विभेद उत्पन्न होते हैं। सहिष्णुता की कमी होने पर यह राष्ट्रीय एकता को प्रभावित कर सकता है।
उदाहरण: भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुए विभेद के परिणाम को दर्शाता है।

③ भाषा (Language): भाषा सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख आधार है। अलग-अलग भाषाओं वाले समूहों के बीच पहचान का अंतर सामाजिक विभेद को बढ़ा सकता है।
उदाहरण: बेल्जियम में डच और फ्रेंच भाषा-भाषी समुदायों के बीच विभेद इसका स्पष्ट उदाहरण है।

8लोकतंत्र विभिन्न सामाजिक समूहों को कैसे सन्निहित करता है

लोकतंत्र में सामाजिक विभेद और उनकी राजनीति स्वाभाविक रूप से मौजूद रहती है। यह हमेशा हानिकारक नहीं होती, बल्कि अल्पसंख्यकों और छोटे समूहों के हितों की रक्षा भी कर सकती है।

यदि माँगें शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से रखी जाएँ तो लोकतंत्र मजबूत होता है। हिंसक तरीकों से समस्या बढ़ती है, जबकि संवाद, सहमति और आपसी समझ से समाधान संभव है।

उदाहरण: भारत में पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से महिलाओं तथा अनुसूचित जाति/जनजाति जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया, जिससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बना।

📌 परीक्षा सारांश

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र को न्यायपूर्ण और समावेशी बनाती है।
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन सत्ता की साझेदारी का उदाहरण है।
लोकतंत्र में विभिन्न विचारों और हितों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं।
सामाजिक विभेद भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र आदि से उत्पन्न हो सकते हैं।
सामाजिक विभेद हमेशा सामाजिक विभाजन का कारण नहीं बनते।
हिंसक संघर्ष सामाजिक विभाजन और अस्थिरता को बढ़ा सकता है।
सामाजिक विभेदों की राजनीति लोकतंत्र के लिए लाभकारी या हानिकारक दोनों हो सकती है।
जाति, धर्म और भाषा सामाजिक विभेद के प्रमुख निर्धारक तत्व हैं।
लोकतंत्र शांतिपूर्ण संवाद, सहमति और भागीदारी के माध्यम से विभिन्न सामाजिक समूहों को साथ लाता है।
पंचायती राज व्यवस्था विभिन्न सामाजिक समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करती है।

🎯 अभ्यास प्रश्न — सभी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

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कुल 22 प्रश्न

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1 हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। कैसे?
उत्तर: हर सामाजिक विभिन्नता अपने-आप सामाजिक विभाजन नहीं बनती। सामाजिक विभाजन तब उत्पन्न होता है जब विभिन्नताएँ टकराव, भेदभाव या संघर्ष का रूप ले लेती हैं।
2 सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों के रूप ले लेते हैं?
उत्तर: जब सामाजिक अंतर समूहों के बीच टकराव, अन्याय, भेदभाव या विरोध पैदा करने लगते हैं, तब वे सामाजिक विभाजन का रूप ले सकते हैं।
3 सामाजिक विभेदों की राजनीति के परिणाम किन-किन चीजों पर निर्भर करते हैं?
उत्तर: इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि सामाजिक विभेदों को राजनीतिक रूप से किस प्रकार उठाया जाता है, विभिन्न समूहों के बीच संबंध कैसे हैं तथा लोकतांत्रिक संस्थाएँ उनकी माँगों और संघर्षों का समाधान किस प्रकार करती हैं।
4 सामाजिक विभेदों को सँभालने के संदर्भ में इनमें से कौन-सा बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लागू नहीं होता?

(क) लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया राजनीति पर भी पड़ता है।
(ख) लोकतंत्र में विभिन्न समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से अपनी शिकायतें जाहिर करना संभव है।
(ग) लोकतंत्र में सामाजिक विभाजनों को हल (accommodate) करने का सबसे अच्छा तरीका है।
(घ) लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर समाज के विखंडन (disintegration) की ओर ले जाता है।
उत्तर: सही उत्तर: (घ) लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर समाज के विखंडन की ओर ले जाता है। लोकतंत्र का उद्देश्य विभिन्न सामाजिक समूहों की माँगों को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से समायोजित करना है।
5 निम्नलिखित तीन बयानों पर विचार करें—
(क) जहाँ सामाजिक विभाजन एक-दूसरे से टकराते हैं (social differences overlap), वहाँ सामाजिक विभाजन होता है।
(ख) यह संभव है एक व्यक्ति की कई पहचान (multiple identities) हों।
(ग) सिर्फ भारत जैसे बड़े देशों में ही सामाजिक विभाजन होते हैं।

इन बयानों में से कौन-कौन से सही हैं?
(अ) क, ख और ग    (ब) क और ख    (स) ख और ग    (द) सिर्फ ग
उत्तर: सही उत्तर: (ब) क और ख। एक व्यक्ति की अनेक पहचान हो सकती हैं और जब सामाजिक विभिन्नताएँ एक-दूसरे से टकराती हैं तो सामाजिक विभाजन गहरा हो सकता है। सामाजिक विभाजन केवल बड़े देशों तक सीमित नहीं है।
6 निम्नलिखित व्यक्तियों में कौन लोकतंत्र में रंगभेद के विरोधी नहीं थे?

(क) किंग मार्टिन लूथर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) ओलंपिक धावक टॉमी स्मिथ एवं जॉन कार्लोस
(घ) जेसी ओवेन्स
उत्तर: सही उत्तर: (घ) जेसी ओवेन्स।
7 निम्नलिखित का मिलान करें—

(क) पाकिस्तान      (अ) धर्मनिरपेक्ष
(ख) हिंदुस्तान     (ब) इस्लाम
(ग) इंग्लैंड       (स) प्रोटेस्टेंट
उत्तर: सही मिलान: पाकिस्तान—इस्लाम; हिंदुस्तान—धर्मनिरपेक्ष; इंग्लैंड—प्रोटेस्टेंट।
8 जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है—

(क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर।
(ख) समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी गई असमान भूमिकाएँ।
(ग) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात।
(घ) लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं को मतदान अधिकार न मिलना।
उत्तर: सही उत्तर: (ख) समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी गई असमान भूमिकाएँ।
9 भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है—

(क) लोकसभा    (ख) विधानसभा    (ग) मंत्रिमंडल    (घ) पंचायती राज संस्थाएँ
उत्तर: सही उत्तर: (घ) पंचायती राज संस्थाएँ।
10 सांप्रदायिक राजनीति के अर्थ संबंधी निम्न कथनों पर गौर करें। सांप्रदायिक राजनीति किस पर आधारित है—

(अ) एक धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है।
(ब) विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी-खुशी साथ रहते हैं।
(स) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं।
(द) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम रखने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
उत्तर: सही उत्तर: (स) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं। सांप्रदायिक राजनीति में धार्मिक पहचान को राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में देखा जाता है।
11 भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन-सा कथन सही है—

(क) यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।
(ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बनाता है।
(ग) सभी लोगों को कोई भी धर्म मानने की आजादी देता है।
(घ) किसी धार्मिक समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।
उत्तर: सही उत्तर: (क) और (ग)। भारतीय संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है और सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था मानने की स्वतंत्रता देता है।
12 ................ पर आधारित विभाजन सिर्फ भारत में है।
उत्तर: सही उत्तर: जाति पर आधारित विभाजन।
13 सूची I और सूची II का मेल करें—

1. अधिकारों और अवसरों के मामले में स्त्री और पुरुष की बराबरी माननेवाला व्यक्ति
2. धर्म को समुदाय का मुख्य आधार माननेवाला व्यक्ति
3. जाति को समुदाय का मुख्य आधार माननेवाला व्यक्ति
4. व्यक्तियों के बीच धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव न करनेवाला व्यक्ति

(क) सांप्रदायिक    (ख) नारीवादी    (ग) धर्म निरपेक्ष    (घ) जातिवादी
उत्तर: सही मिलान: 1—(ख) नारीवादी; 2—(क) सांप्रदायिक; 3—(घ) जातिवादी; 4—(ग) धर्म निरपेक्ष।

लघु उत्तरीय प्रश्न

14 ‘सामाजिक विभिन्नताओं की राजनीति के परिणामस्वरूप ही लोकतंत्र के व्यवहार में परिवर्तन होता है।’ भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में इसे स्पष्ट करें।
उत्तर: सामाजिक विभिन्नताओं की राजनीति से अलग-अलग समूह अपनी माँगें और हित लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने रखते हैं। इससे प्रतिनिधित्व, आरक्षण, सामाजिक न्याय और समानता से संबंधित नीतियों तथा लोकतांत्रिक व्यवहार में परिवर्तन हो सकता है।
15 सत्तर के दशक से आधुनिक दशक के बीच भारतीय लोकतंत्र का सफर (सामाजिक न्याय के संदर्भ में) का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर: भारतीय लोकतंत्र में समय के साथ पिछड़े, वंचित और कमजोर सामाजिक समूहों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। सामाजिक न्याय, आरक्षण, समान अवसर और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे लोकतांत्रिक राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण बने।
16 भारतीय समाज में लोकतंत्र की जिम्मेदारी और उद्देश्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर: भारतीय लोकतंत्र का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान अधिकार, राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व देना तथा सामाजिक विविधताओं के बीच न्याय, समानता और समावेश सुनिश्चित करना है।
17 भारत में किस तरह जातिगत असमानताएँ जारी हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर: जाति के आधार पर सामाजिक भेदभाव, अवसरों में असमानता, सामाजिक स्तर और पेशे से जुड़े अंतर तथा कुछ समूहों के साथ भेदभाव जैसी समस्याएँ जातिगत असमानताओं के बने रहने को दर्शाती हैं।
18 क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते? इसके दो कारण बताइए।
उत्तर: पहला, प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में अनेक जातियाँ और सामाजिक समूह होते हैं। दूसरा, मतदाता केवल जाति ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार, राजनीतिक दल, नीतियाँ और स्थानीय मुद्दों जैसे अन्य कारणों को भी ध्यान में रखते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

19 विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और संभव हो तो साथ एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर: सांप्रदायिक राजनीति के रूपों में एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताना, धर्म के आधार पर राजनीतिक प्रभुत्व की माँग करना, धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक समर्थन जुटाना तथा धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष पैदा करना शामिल है।
20 जीवन के विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिसमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव है या वे कमजोर स्थिति में हैं।
उत्तर: शिक्षा और रोजगार के अवसरों में असमानता, वेतन में अंतर, घरेलू कार्य का असमान बोझ, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी तथा हिंसा और भेदभाव जैसी समस्याएँ महिलाओं की कमजोर स्थिति को दर्शाती हैं।
21 भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है?
उत्तर: भारत की विधायिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पुरुषों की तुलना में कम रहा है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण ने उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
22 किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाते हैं।
उत्तर: भारतीय संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और राज्य किसी एक धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्थापित नहीं करता। साथ ही धर्म के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध समानता का संवैधानिक सिद्धांत लागू है।

🔄 एक नजर में अध्याय का पुनरावर्तन

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में शक्ति के केंद्रीकरण को रोकती है। सामाजिक विभेद समाज की विविधता को दर्शाते हैं, लेकिन जब वे टकराव और संघर्ष का रूप लेते हैं तो सामाजिक विभाजन उत्पन्न हो सकता है। लोकतंत्र संवाद, सहमति, शांतिपूर्ण भागीदारी और प्रतिनिधित्व के माध्यम से विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों को समायोजित करने का प्रयास करता है।

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