History Chapter 5: Economy and Livelihood | Bihar Board Class 10 Notes
अध्याय 5: अर्थव्यवस्था एवं आजीविका
① अर्थव्यवस्था एवं आजीविका
अर्थव्यवस्था किसी देश की आर्थिक व्यवस्था है। इसमें वस्तुओं का उत्पादन, वितरण और उपभोग शामिल होता है। आजीविका उन साधनों को कहते हैं जिनसे लोग आय अर्जित करते हैं और जीवनयापन करते हैं। अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका एक-दूसरे पर निर्भर होती हैं।
② औद्योगीकरण और आजीविका पर प्रभाव
औद्योगीकरण के कारण मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ। इससे उद्योगों का विकास हुआ और रोजगार के नए अवसर पैदा हुए। दूसरी ओर, पारंपरिक कुटीर उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
औद्योगीकरण के प्रमुख कारण
- स्वतंत्र व्यापार और सरकार की अहस्तक्षेप (Laissez-faire) नीति।
- बढ़ती जनसंख्या और वस्तुओं की मांग।
- नई मशीनों के आविष्कार।
- कोयला और लोहे जैसे प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता।
- सस्ता श्रम और पूँजी की उपलब्धता।
- बेहतर यातायात तथा उपनिवेशों से कच्चे माल की प्राप्ति।
③ ब्रिटेन में औद्योगीकरण का प्रारंभ
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई। पहले अधिकांश लोग कृषि और कुटीर उद्योगों पर निर्भर थे। बढ़ती मांग के कारण मशीनों का उपयोग शुरू हुआ और कारखाने स्थापित होने लगे। इससे ब्रिटेन विश्व का पहला औद्योगिक देश बन गया।
गिल्ड प्रणाली और कुटीर उद्योग
गिल्ड प्रणाली में कुशल कारीगर अपने-अपने व्यवसाय का संचालन करते थे। बढ़ती मांग के कारण व्यापारियों ने गाँवों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया। इनमें पुरुषों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी काम करते थे।
आदि-औद्योगीकरण
④ ⚙️ प्रमुख औद्योगिक आविष्कार
1764; एक साथ कई तकुओं पर सूत कातने वाली मशीन।
1769; सूत कातने की मशीन।
1779; बारीक और मजबूत सूत बनाने वाली मशीन।
1785; मशीन से कपड़ा बुनने वाला करघा।
कपड़ा बुनने की गति बढ़ाने वाला उपकरण।
1769; कारखानों, रेलगाड़ियों और जहाजों में उपयोग।
⑤ औपनिवेशिक लाभ, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद
ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों से सस्ता कच्चा माल प्राप्त किया और तैयार माल वहाँ बेचकर लाभ कमाया। उपनिवेश बड़े बाजार भी बने। इससे ब्रिटेन के उद्योगों का तेजी से विकास हुआ।
औद्योगीकरण के बाद यूरोपीय देशों को कच्चे माल और नए बाजारों की आवश्यकता हुई। इसलिए उन्होंने एशिया और अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार किया। इससे साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विस्तार हुआ।
⑥ उपनिवेशवाद और भारत पर प्रभाव
ब्रिटेन में औद्योगीकरण के बाद कच्चे माल और नए बाजारों की आवश्यकता बढ़ी। अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित किया। इससे भारत के उद्योग, व्यापार और कृषि पर गहरा प्रभाव पड़ा।
हस्तशिल्प उद्योग पर प्रभाव
अंग्रेजों की नीतियों के कारण भारत का हस्तशिल्प उद्योग कमजोर हुआ। इंग्लैंड में बने सस्ते मशीन निर्मित वस्त्र भारत में बेचे जाने लगे। इससे भारतीय कारीगरों की आय कम हुई और अनेक लोग बेरोजगार हो गए।
चार्टर एक्ट, 1813
1813 के चार्टर एक्ट के बाद भारत में ब्रिटिश व्यापारियों को स्वतंत्र रूप से व्यापार करने की अनुमति मिली। ब्रिटिश वस्तुओं का आयात बढ़ा और भारतीय कुटीर उद्योगों को विदेशी वस्तुओं से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी।
रेलवे का विकास
अंग्रेजों ने भारत में रेलवे का निर्माण मुख्यतः अपने व्यापारिक हितों के लिए किया। रेलवे से कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुँचाना आसान हुआ। बाद में रेलवे भारतीय जनता के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुई।
⑦ निरूद्योगीकरण और कुटीर उद्योग का पतन
मशीनों से बने सस्ते सामान के कारण हाथ से बनी वस्तुओं की मांग घटने लगी। कुटीर उद्योगों के पतन से कृषि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ा और ग्रामीण गरीबी तथा बेरोजगारी में वृद्धि हुई।
⑧ मजदूर वर्ग और उनकी आजीविका
कारखानों के बढ़ने से नया मजदूर वर्ग पैदा हुआ। मजदूर कम मजदूरी पर लंबे समय तक काम करते थे। काम का वातावरण कठिन और अस्वास्थ्यकर था। महिलाओं और बच्चों से भी कठोर श्रम कराया जाता था।
स्लम बस्तियों की शुरुआत
रोजगार की खोज में बड़ी संख्या में लोग शहरों में आए। पर्याप्त आवास न होने के कारण वे झुग्गी-झोपड़ियों में रहने लगे। वहाँ सफाई, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं का अभाव था।
मजदूर आंदोलन
मजदूरों ने कम मजदूरी और लंबे कार्य समय का विरोध किया। इंग्लैंड में 1830–1848 का चार्टिस्ट आंदोलन मजदूरों का प्रमुख आंदोलन था। इससे मजदूरों में अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी।
⑨ मजदूर अधिकार और कानून
⑩ औद्योगीकरण के परिणाम
- उत्पादन और व्यापार में वृद्धि हुई।
- नए औद्योगिक नगर और शहरीकरण विकसित हुए।
- मजदूर वर्ग का विकास हुआ।
- सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बढ़ीं।
- पारंपरिक कुटीर उद्योगों को नुकसान पहुँचा।
भारत में जमशेदपुर, सिंदरी, धनबाद और डालमियानगर जैसे शहर उद्योगों के केंद्र बने। रोजगार की तलाश में लोगों के शहरों की ओर आने से शहरीकरण बढ़ा।
⑪ 📅 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण वर्ष
- 1764 — स्पिनिंग जेनी
- 1769 — स्पिनिंग फ्रेम और वाष्प इंजन का विकास
- 1779 — स्पिनिंग म्यूल
- 1785 — पावरलूम
- 1813 — चार्टर एक्ट
- 1830–48 — चार्टिस्ट आंदोलन
- 1881 — फैक्ट्री एक्ट
- 1920 — AITUC की स्थापना
- 1926 — मजदूर संघ अधिनियम
- 1948 — न्यूनतम मजदूरी अधिनियम
⑫ 👤 महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
- जेम्स हारग्रीव्स — स्पिनिंग जेनी।
- रिचर्ड आर्कराइट — स्पिनिंग फ्रेम।
- जॉन के — फ्लाइंग शटल।
- सैम्यूल क्राम्पटन — स्पिनिंग म्यूल।
- एडमंड कार्टराइट — पावरलूम।
- जेम्स वॉट — वाष्प इंजन।
⑬ परीक्षा सारांश
- औद्योगिक क्रांति की शुरुआत ब्रिटेन में हुई।
- आदि-औद्योगीकरण आधुनिक औद्योगीकरण की प्रारंभिक अवस्था थी।
- उपनिवेशवाद के कारण भारत के कुटीर और हस्तशिल्प उद्योग कमजोर हुए।
- इस प्रक्रिया को निरूद्योगीकरण कहा जाता है।
- औद्योगीकरण से नगरों का विकास और मजदूर वर्ग का उदय हुआ।
- AITUC की स्थापना 1920 में हुई।
- मजदूर संघ अधिनियम, 1926 ने श्रमिक संघों को कानूनी मान्यता दी।
⑭ 🔄 एक नजर में पुनरावर्तन
1764 → स्पिनिंग जेनी → 1769 → स्पिनिंग फ्रेम/वाष्प इंजन → 1779 → स्पिनिंग म्यूल → 1785 → पावरलूम → 1813 → चार्टर एक्ट → 1881 → फैक्ट्री एक्ट → 1920 → AITUC → 1926 → मजदूर संघ अधिनियम → 1948 → न्यूनतम मजदूरी अधिनियम।
⑮ 🎯 अभ्यास प्रश्न
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
औद्योगीकरण के पीछे कई कारण थे। बढ़ती जनसंख्या से वस्तुओं की मांग बढ़ी। नई मशीनों के आविष्कार से उत्पादन तेज और अधिक मात्रा में होने लगा। कोयला और लोहा जैसे प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध थे। स्वतंत्र व्यापार और सरकार की अहस्तक्षेप नीति ने उद्योगों को बढ़ावा दिया। सस्ता श्रम, पूँजी और बेहतर यातायात व्यवस्था भी सहायक रही। उपनिवेशों से कच्चा माल और नए बाजार मिलने के कारण यूरोपीय उद्योगों का विस्तार हुआ।
औद्योगीकरण से मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ और व्यापार बढ़ा। नए औद्योगिक नगर विकसित हुए तथा शहरीकरण तेज हुआ। कारखानों में काम करने वाला नया मजदूर वर्ग पैदा हुआ। दूसरी ओर, मजदूरों को कम मजदूरी और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा। मशीन निर्मित सस्ते सामान से कुटीर उद्योगों को नुकसान हुआ। भारत में अनेक कारीगर बेरोजगार हुए और खेती या मजदूरी पर निर्भर हो गए।
जब कोई शक्तिशाली देश किसी दूसरे देश पर राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण स्थापित करके उसके संसाधनों का अपने हित में उपयोग करता है, तो इसे उपनिवेशवाद कहा जाता है। औद्योगीकरण के बाद यूरोपीय देशों को कच्चे माल और नए बाजारों की आवश्यकता बढ़ी। इसलिए उन्होंने एशिया और अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार किया। उपनिवेशों से सस्ता कच्चा माल लिया गया और तैयार माल वहाँ बेचा गया। इस प्रकार औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद के विस्तार को बढ़ावा दिया।
कुटीर उद्योग ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत उपयोगी थे। इनमें घरों और छोटे स्तर पर वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था। इन उद्योगों से ग्रामीण लोगों को रोजगार और आय प्राप्त होती थी। पुरुषों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी इसमें काम करते थे। कुटीर उद्योगों में हाथ से बनी वस्तुओं और स्थानीय कौशल का उपयोग होता था। मशीन निर्मित सस्ते सामान के कारण इनके कमजोर होने से अनेक कारीगर बेरोजगार हुए।
औद्योगीकरण से उद्योगपति, व्यापारी और मजदूर जैसे नए सामाजिक वर्गों का विकास हुआ। मजदूरों ने अपनी खराब स्थिति और अधिकारों के लिए संगठन बनाकर आंदोलन शुरू किए। इससे राजनीतिक जागरूकता बढ़ी। मजदूरों ने बेहतर मजदूरी, कम कार्य समय और राजनीतिक अधिकारों की मांग की। चार्टिस्ट आंदोलन जैसे आंदोलनों ने राजनीतिक सुधारों को बल दिया। आगे चलकर श्रमिक संगठनों और मजदूर आंदोलनों ने सरकारों पर कानून बनाने का दबाव डाला।
अध्याय का सार
औद्योगीकरण ने उत्पादन, व्यापार, रोजगार और नगरों के विकास को गति दी। इसके साथ नया मजदूर वर्ग पैदा हुआ और श्रमिक अधिकारों के लिए आंदोलन हुए। यूरोपीय औद्योगीकरण ने उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया। भारत में ब्रिटिश नीतियों से कुटीर और हस्तशिल्प उद्योग कमजोर हुए तथा निरूद्योगीकरण बढ़ा। इस प्रकार औद्योगीकरण ने अर्थव्यवस्था, समाज और लोगों की आजीविका में व्यापक परिवर्तन किए।
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