कक्षा 10
📝 Ayush Study Point में आप सभी छात्रों का स्वागत हैं 🚀 FREE में बिहार बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें 📝 सभी विषयों के नोट्स पढ़ें 🔥 वस्तुनिष्ट, लघु उत्तरीय और दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों की तैयारी करें 🔥 MCQs Test दें और अपना मूल्यांकन करें। धन्यवाद !

Geography Chapter 1: Resources and Development | Bihar Board Class 10 Notes

Bihar Board Class 10 Geography Chapter 1: संसाधन एवं उपयोग
📘 Bihar Board  |  Class 10  |  Geography

अध्याय 1: संसाधन एवं उपयोग

Resources and Use — सरल Self Study Notes, महत्वपूर्ण तथ्य और परीक्षा अभ्यास
🌍 संसाधन🌱 भूमि व मृदा💧 जल संसाधन🌳 वन व वन्यजीव⛏️ खनिज⚡ ऊर्जा
📖 1. संसाधन का महत्व

संसाधन वे सभी वस्तुएँ हैं जो मनुष्य की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होती हैं। ये मुख्य रूप से भौतिक और जैविक संसाधन होते हैं।

भौतिक संसाधनभूमि, मिट्टी, जल, खनिज आदि।
जैविक संसाधनवनस्पति, जंगली जानवर, जलीय जीव आदि।
मानव संसाधनज्ञान, कौशल और तकनीक से जुड़ा महत्वपूर्ण संसाधन।
🔑 जिम्मरमैन का प्रसिद्ध कथन: “संसाधन होते नहीं; बनते हैं।”

भौतिक एवं जैविक पदार्थ तकनीक और ज्ञान के सहारे संसाधन बनते हैं। उदाहरण के लिए कोयला और पेट्रोलियम पृथ्वी में लाखों वर्षों से मौजूद थे, लेकिन उनका उपयोग करने की तकनीक विकसित होने के बाद ही वे उपयोगी संसाधन बने।

कवि की कविता, गायक की गायकी और चित्रकार की चित्रकारी भी संसाधन हैं, क्योंकि इनसे आजीविका प्राप्त होती है। मनुष्य स्वयं भी एक महत्वपूर्ण संसाधन है, क्योंकि उसके पास ज्ञान, कौशल और तकनीक होती है।

🇯🇵 जापान का उदाहरण: जापान के पास प्राकृतिक संसाधन बहुत कम हैं, फिर भी वह अपने मानव-संसाधन, ज्ञान और तकनीक के कारण विकसित देशों में शामिल है।

2संसाधनों का वर्गीकरण

संसाधनों को चार आधारों पर बाँटा जाता है—

उत्पत्ति के आधार पर
जैव और अजैव संसाधन।
उपयोगिता के आधार पर
नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन।
स्वामित्व के आधार पर
व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन।
विकास की स्थिति के आधार पर
संभाव्य, विकसित, भंडार और संचित-कोष संसाधन।

3संसाधन नियोजन

संसाधन नियोजन का अर्थ है संसाधनों का सोच-समझकर और सही तरीके से उपयोग करना। भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का वितरण समान नहीं है। इसलिए संसाधन नियोजन बहुत आवश्यक है।

संसाधन नियोजन के प्रमुख चरण

संसाधनों की पहचान के लिए सर्वेक्षण करना।
संसाधनों के मानचित्र तैयार करना।
उनकी मात्रा और गुणवत्ता का आकलन करना।
उचित तकनीक और कौशल की व्यवस्था करना।
राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ संसाधन विकास योजनाओं में तालमेल बनाना।

4संसाधनों का संरक्षण

संसाधनों का संरक्षण का अर्थ है उनका सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करना, ताकि वे भविष्य के लिए भी सुरक्षित रहें।

🔑 महात्मा गाँधी का विचार: “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन लालच भरने के लिए नहीं।”

संसाधनों के अत्यधिक दोहन से ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, अम्लीय वर्षा, मिट्टी का कटाव और अन्य पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

5सतत् विकास

सतत् विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो आज की जरूरतों को पूरा करे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की जरूरतें पूरी करने की क्षमता को नुकसान न पहुँचाए।

सरल शब्दों में: संसाधनों का ऐसा उपयोग करना चाहिए जिससे वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों को भी उनका लाभ मिलता रहे।

6🌱 भूमि संसाधन

भूमि वह आधार है जिस पर हम रहते हैं और अपनी सभी आर्थिक गतिविधियाँ करते हैं। कृषि, व्यापार, उद्योग आदि सभी कार्य भूमि पर ही किए जाते हैं। इसलिए भूमि सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है।

भूमि पर होने वाले मुख्य कार्य

कृषि और वानिकी।
पशु चराना।
मछली पकड़ना।
खनन।
परिवहन और संचार के लिए सड़क तथा रेल का निर्माण।
⚠️ महत्वपूर्ण: भूमि एक सीमित संसाधन है। इसे बढ़ाया नहीं जा सकता। इसलिए इसका सोच-समझकर और योजनाबद्ध उपयोग करना आवश्यक है।

भारत में भूमि का भौतिक स्वरूप

मैदान — 43%
कृषि और उद्योग के लिए सबसे उपयुक्त।
पर्वत — 30%
नदियों के स्रोत, पर्यटन और पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण।
पठार — 27%
खनिज, जीवाश्म ईंधन और वन संपदा के महत्वपूर्ण भंडार।

7🪨 मृदा — परिचय और निर्माण

पृथ्वी की सबसे ऊपरी पतली परत, जो टूटी-फूटी चट्टानों और जैव पदार्थों से मिलकर बनती है, मृदा कहलाती है। मृदा एक महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है।

मृदा पौधों को उगाने में सहायता करती है और जीव-जंतुओं के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मृदा बनने में बहुत लंबा समय लगता है, इसलिए इसका संरक्षण आवश्यक है।

मृदा निर्माण के प्रमुख कारक

धरातल की बनावट, मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, जैव पदार्थ या ह्यूमस, खनिज कण और समय।

भारत में मृदा के 6 प्रमुख प्रकार

① जलोढ़ मृदा

नदियाँ पहाड़ों से मिट्टी बहाकर लाती हैं और मैदानों में जमा करती हैं। प्रमुख क्षेत्र उत्तर भारत का मैदान, सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र, राजस्थान और गुजरात के कुछ भाग तथा पूर्वी तटीय मैदान के नदी डेल्टा हैं।

विशेषताएँ: पोटाश, फास्फोरस और चूना अधिक; नाइट्रोजन और जैव पदार्थों की कमी; कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।

बांगर: पुरानी जलोढ़ मिट्टी, जिसमें कंकड़ और बजरी अधिक। खादर: नई जलोढ़ मिट्टी, जिसमें बारीक कण और अधिक उपजाऊ मिट्टी होती है।

मुख्य फसलें: गन्ना, चावल, गेहूँ, मक्का और दलहन।

💡 बिहार: उत्तर बिहार में बालू प्रधान जलोढ़ भूमि को दियारा भूमि कहा जाता है।
② काली मृदा

काली कपासी मृदा या रेगुर भी कहा जाता है। इसका निर्माण मुख्यतः बेसाल्ट लावा और मूल चट्टानों के टूटने-गलने से हुआ है।

क्षेत्र: दक्कन का पठार, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ भाग। विशेषताएँ: नमी रोकने की क्षमता अधिक, कैल्शियम-मैग्नीशियम-पोटाश-चूना से भरपूर, फास्फोरस की कमी, गर्मियों में दरारें और गीली होने पर चिपचिपी।

मुख्य फसल: कपास; इसके अलावा गन्ना, प्याज, गेहूँ और फल।

③ लाल एवं पीली मृदा

ग्रेनाइट जैसी आग्नेय चट्टानों के टूटने और परिवर्तन से बनती है। लौह तत्व के कारण लाल तथा पानी मिलने पर पीली दिखाई दे सकती है।

क्षेत्र: तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छोटानागपुर और मेघालय पठार।

विशेषताएँ: ह्यूमस की कमी; अपेक्षाकृत कम उपजाऊ; खाद और उर्वरक से उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। फसलें: चावल, ज्वार-बाजरा, मक्का, मूँगफली और तंबाकू।

④ लैटेराइट मृदा

“LATER” शब्द का अर्थ ईंट बताया जाता है। यह मिट्टी सूखने पर ईंट की तरह कठोर हो जाती है। अधिक गर्मी और वर्षा में पोषक तत्व नीचे चले जाते हैं; इस प्रक्रिया को निक्षालन कहते हैं।

क्षेत्र: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम की पहाड़ियाँ। विशेषताएँ: लाल रंग, लौह और एल्युमीनियम ऑक्साइड, कम ह्यूमस। फसलें: चाय, कहवा और काजू।

⑤ मरुस्थलीय मृदा

कम वर्षा वाले बालू प्रधान क्षेत्रों में पाई जाती है। प्रमुख क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी पंजाब हैं। रंग लाल या हल्का भूरा, बालू अधिक तथा वनस्पति और उर्वरता कम होती है। सिंचाई से कपास, चावल और गेहूँ उगाए जा सकते हैं।

⑥ पर्वतीय मृदा

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। नदी घाटियों में उपजाऊ जलोढ़ मृदा, ऊँचे भागों में मोटे कणों वाली मिट्टी और कुछ क्षेत्रों में अम्लीय मिट्टी मिलती है। प्रमुख फसलें सेब, नाशपाती, चावल और आलू हैं।

भूमि उपयोग

वन क्षेत्र, कृषि के लिए अनुपयुक्त बंजर भूमि, गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि, स्थायी चारागाह, बाग-बगीचे और उपवन, कृषि योग्य बंजर भूमि, वर्तमान परती भूमि, पुरानी परती भूमि तथा शुद्ध बोई गई भूमि भूमि उपयोग की प्रमुख श्रेणियाँ हैं।

प्रभावित करने वाले कारक: भौतिक—भूमि की बनावट, जलवायु और मिट्टी। मानवीय—जनसंख्या, तकनीक, संस्कृति और परंपरा।

भू-क्षरण और भू-निम्नीकरण

मिट्टी का अपने स्थान से किसी कारण से हट जाना भू-क्षरण कहलाता है। प्राकृतिक कारणों में तेज बहता पानी, आँधी-पवन, हिमानी, समुद्री लहरें और गुरुत्व बल हैं। मानवीय कारणों में वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई, खनन और रसायनों का अत्यधिक उपयोग हैं।

💧 जलाक्रांतता: अधिक सिंचाई से भूमि में पानी भर जाता है। इससे मिट्टी में लवण और क्षार बढ़ सकते हैं और उत्पादकता घट सकती है।

भू-संरक्षण

फसल-चक्रण, समोच्च जुताई, पट्टिका कृषि, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जैविक खाद तथा वृक्षारोपण भू-संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं।

8💧 जल संसाधन

जल — परिचय

जल जीवन का आधार है। पृथ्वी की सतह का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, इसलिए पृथ्वी को “नीला ग्रह (Blue Planet)” कहते हैं।

💡 जरूरी तथ्य: विश्व के कुल जल का 96.5% जल महासागरों में है, जो खारा है। मात्र 2.5% जल मीठा है। मीठे जल का भी लगभग 75% भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फ के रूप में जमा है।

जल चक्र (Water Cycle): जल का नवीनीकरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है। इसलिए जल एक नवीकरणीय संसाधन है।

जीवों में जल का महत्व: जीव-जंतुओं में लगभग 65% जल होता है। पौधों में लगभग 65% से 99% तक जल होता है।

जल के स्रोत

① भू-पृष्ठीय जल
नदी, झील और तालाब आदि।
② भूमिगत जल
वर्षा का जल जमीन के छिद्रों से रिसकर अंदर जमा होता है।
③ वायुमंडलीय जल
वाष्प, बादल, वर्षा, ओस और ओले।
④ महासागरीय जल
पृथ्वी का सबसे बड़ा जल-भंडार, लेकिन खारा।

भू-पृष्ठीय जल का निर्माण: वर्षा का कुछ जल वाष्प बनकर उड़ जाता है, कुछ जल जमीन में चला जाता है और शेष नदी-नालों तथा झीलों से होकर समुद्र में पहुँचता है।

विश्व में जल का वितरण

जल गोलार्द्ध: दक्षिणी गोलार्द्ध में जल की मात्रा अधिक है। स्थल गोलार्द्ध: उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की मात्रा अधिक है।

भारत में जल संसाधन का वितरण

भारत में जल संसाधनों का वितरण असंतुलित है।

महत्वपूर्ण आँकड़ामात्रा
विश्व की जनसंख्या में भारत का हिस्सा16%
विश्व के मीठे जल में भारत का हिस्सा4%
वार्षिक वर्षा से प्राप्त जललगभग 4000 घन किमी
जमीन की सतह पर उपलब्ध जललगभग 1869 घन किमी
वास्तव में उपयोग हो पाने वाला जललगभग 690 अरब घन मीटर

महत्वपूर्ण नदियाँ: गंगा द्रोणी में उपयोग योग्य जल भंडारण क्षमता सर्वाधिक है। ब्रह्मपुत्र का वार्षिक प्रवाह बहुत अधिक है, लेकिन उपयोग क्षमता कम है। ताप्ती में अनुपात की दृष्टि से उपयोग क्षमता बहुत अधिक है।

भूमिगत जल: भारत में भूमिगत जल का विशाल भंडार है। इसका बड़ा हिस्सा उत्तरी मैदान में उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल का महत्वपूर्ण हिस्सा पाया जाता है।

जल का उपयोग

पेयजल और घरेलू कार्य, कृषि और सिंचाई, उद्योग, जल-विद्युत उत्पादन, मछली पालन, जल-क्रीड़ा तथा परमाणु संयंत्रों को ठंडा करने में जल का उपयोग होता है। कृषि और सिंचाई में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है।

प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता

1951
5177 घन मीटर
2001
1829 घन मीटर
2025
1342 घन मीटर (अनुमानित)
⚠️ जल संकट: फॉल्कन मार्क के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 1000 घन मीटर जल की आवश्यकता बताई गई है। इससे कम उपलब्धता जल संकट की स्थिति को दर्शाती है।

9🏗️ बहुउद्देशीय परियोजनाएँ

ऐसी नदी-घाटी परियोजना जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती है, बहुउद्देशीय परियोजना कहलाती है।

उदाहरण: एक ही बाँध से सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण और मछली पालन आदि कार्य किए जाएँ, तो वह बहुउद्देशीय परियोजना है।

प्रमुख उद्देश्य

बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, जल-विद्युत उत्पादन, उद्योगों को जल उपलब्ध कराना, मछली पालन, पर्यटन तथा परिवहन और मनोरंजन।

🔑 महत्वपूर्ण: पं. जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” कहा था।

प्रमुख परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर, गोदावरी, कृष्णा, स्वर्णरेखा और सोन परियोजना।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के नुकसान

नदी का प्राकृतिक बहाव रुकना, तलछट जमा होने से जलीय जीवों को नुकसान, कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की नई समस्या, लोगों का विस्थापन, कुछ क्षेत्रों में भूकंपीय जोखिम और अधिक सिंचाई से मिट्टी में लवणता बढ़ना इसके प्रमुख नुकसान हैं।

प्रमुख जनआंदोलन: नर्मदा बचाओ आंदोलन और टिहरी बाँध आंदोलन।

जल संकट

जब किसी व्यक्ति, क्षेत्र या देश को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता है, तो उसे जल संकट कहते हैं। इसके मुख्य कारण तेजी से बढ़ती जनसंख्या, उद्योगों और शहरों की वृद्धि, जल का असमान वितरण, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण, औद्योगिक कचरा और रसायन तथा कीटनाशक और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग हैं।

जल प्रदूषण के उदाहरण: बिहार और पश्चिम बंगाल में भूमिगत जल में आर्सेनिक की समस्या; राजस्थान और महाराष्ट्र में फ्लोराइड की समस्या; कानपुर के चमड़ा उद्योगों से गंगा में दूषित जल का प्रवाह।

10🌧️ जल संरक्षण एवं वर्षा जल संग्रहण

राष्ट्रीय जल नीति

सरकार ने सितंबर 1987 में राष्ट्रीय जल नीति बनाई, जिसे बाद में राष्ट्रीय जल नीति 2002 के रूप में संशोधित किया गया।

मुख्य सिद्धांत: जल की उपलब्धता बनाए रखना; जल को प्रदूषित होने से बचाना; प्रदूषित जल को साफ करके दोबारा उपयोग करना।

जल संरक्षण के प्रमुख उपाय

① भूमिगत जल पुनर्पूर्ति
वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण और आर्द्रभूमियों के संरक्षण द्वारा भूमिगत जल की पुनर्पूर्ति की जा सकती है।
② जल संभर प्रबंधन
वर्षा और बाढ़ के जल को छोटी-छोटी इकाइयों में एकत्र करके खेती, पेयजल और वन के लिए उपयोग करना।
③ आधुनिक सिंचाई
ड्रिप सिंचाई में जड़ों तक बूँद-बूँद पानी और स्प्रिंकलर में फुहारों के रूप में पानी दिया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती से जल और मिट्टी का बहाव कम किया जाता है।

वर्षा जल संग्रहण

वर्षा के पानी को एकत्र करके उसका उपयोग करना वर्षा जल संग्रहण कहलाता है। यह जल संरक्षण की एक टिकाऊ और प्रभावी विधि है।

क्षेत्रपरंपरागत प्रणाली / उपयोग
पश्चिमी हिमालयगुल / कुल — खेतों की सिंचाई
राजस्थानटाँका — पेयजल संग्रह
जैसलमेरखादीन — खेती के लिए जल और नमी संरक्षण
राजस्थान के अन्य क्षेत्रजोहड़ — जल संग्रहण
पश्चिम बंगालबाढ़ जल वाहिकाएँ — सिंचाई
मेघालयछत पर वर्षा जल संग्रहण
कर्नाटकमैसूर के गंडाथूर गाँव में छत जल संग्रहण
💡 महत्वपूर्ण तथ्य: भूमिगत जल का एक महत्वपूर्ण भाग वर्षा जल के जमीन में रिसने से प्राप्त होता है। चेरापूँजी और मॉसिनराम में अत्यधिक वर्षा होने के बावजूद जल संकट की स्थिति देखी जाती है। तरुण भारत संघ जल संरक्षण के लिए कार्य करने वाली संस्था है।

11🌾 सोन परियोजना — बिहार

सोन परियोजना बिहार की प्रमुख और पुरानी नदी-घाटी परियोजनाओं में से एक है।

मुख्य तथ्यजानकारी
स्थापना1874 ई.
स्थानडेहरी के समीप सोन नदी
नहर की कुल लंबाईलगभग 130 किमी
सिंचित भूमिलगभग 3 लाख हेक्टेयर
पश्चिमी भाग की बिजली6.6 मेगावाट
पूर्वी भाग की बिजली3.3 मेगावाट

पूर्वी नहर: पटना, गया और औरंगाबाद। पश्चिमी नहर: भोजपुर, बक्सर, रोहतास और चौसा।

1968 ई.: डेहरी से लगभग 10 किमी दूर इंद्रपुरी में बाँध बनाकर परियोजना को बहुउद्देशीय रूप दिया गया।

🍚 महत्वपूर्ण: सोन परियोजना क्षेत्र को “बिहार का चावल का कटोरा (Rice Bowl of Bihar)” कहा जाता है।

बिहार की अन्य प्रमुख परियोजनाएँ: गंडक परियोजना, कोसी परियोजना, दुर्गावती जलाशय परियोजना, बागमती परियोजना, ऊपरी किऊल जलाशय परियोजना और बरनार जलाशय परियोजना।

12🌳 वन एवं वन्य प्राणी संसाधन

वन एवं वन्य प्राणी — परिचय

वन एवं वन्य प्राणी मानव जीवन के प्रमुख साथी हैं। वन केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वन पेड़-पौधों एवं झाड़ियों से ढके बड़े भू-भाग को कहते हैं। जो वन अपने आप उगते हैं वे प्राकृतिक वन तथा जो मनुष्य द्वारा लगाए जाते हैं वे मानव निर्मित वन (वानिकी) कहलाते हैं।

वनों का महत्व

वर्षा और जलवायु संतुलन में सहायक।
बाढ़ और मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।
CO₂ को अवशोषित करके ऑक्सीजन देते हैं।
अनेक जीव-जंतुओं को प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं।
लकड़ी, फल, जड़ी-बूटी, रबर और गोंद जैसी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
खाद्य श्रृंखला की पहली कड़ी वनस्पति है।
💡 बिहार: हिमालयी वनों का गंडक और कोसी नदियों की बाढ़ को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान है।

भारत में वन क्षेत्र

भारत वन क्षेत्र की दृष्टि से विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है। 2011 में भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 21.05% वन क्षेत्र था। वर्तमान में लगभग 20.55% क्षेत्र में वन हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में लगभग 90.3% भूमि पर वन हैं। वनाच्छादित क्षेत्र की दृष्टि से मध्यप्रदेश प्रमुख राज्य है। पूर्वोत्तर भारत वन संपदा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।

घनत्व के आधार पर वनों के प्रकार

① अत्यंत सघन वन
पेड़ों का घनत्व 70% से अधिक।
② सघन वन
पेड़ों का घनत्व 40–70%।
③ खुले वन
पेड़ों का घनत्व 10–40%।
④ झाड़ियाँ एवं अन्य वन
पेड़ों का घनत्व 10% से कम।
⑤ मैंग्रोव वन
समुद्र के किनारे खारे पानी में पाए जाते हैं। भारत में इनका सबसे बड़ा क्षेत्र पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में है।
💡 महत्व: मैंग्रोव समुद्री लहरों और तूफानों के प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं।

प्रशासनिक दृष्टि से वनों का वर्गीकरण

① आरक्षित वन
ये सबसे अधिक संरक्षित वन होते हैं। इनमें लकड़ी काटने और पशुचारण पर कड़े प्रतिबंध होते हैं।
② रक्षित वन
विशेष नियमों के अंतर्गत सीमित पशुचारण और लकड़ी काटने की अनुमति हो सकती है।
③ अवर्गीकृत वन
ये सरकार, व्यक्तियों या समुदायों के अधीन हो सकते हैं।

महत्वपूर्ण: भारत के वनों का लगभग 54% आरक्षित, 29% रक्षित और 17% अवर्गीकृत वन बताया गया है।

बिहार में वन की स्थिति

झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में वन क्षेत्र काफी कम रह गया। बिहार में लगभग 7.1% भौगोलिक क्षेत्र में वन बताए गए हैं। पश्चिमी चंपारण, मुंगेर, बांका, जमुई, नवादा, गया, रोहतास, कैमूर और औरंगाबाद वन क्षेत्र की दृष्टि से प्रमुख जिले हैं।

वन ह्रास के प्रमुख कारण

कृषि भूमि का विस्तार, झूम खेती, नदी घाटी एवं बहुउद्देशीय परियोजनाएँ, खनन कार्य, एकल वृक्षारोपण, पशुचारण, ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई, नगरीकरण और औद्योगीकरण वन ह्रास के प्रमुख कारण हैं।

🌿 हिमालय यव: यव एक औषधीय पेड़ है। इसकी छाल और पत्तियों से टैक्सोल नामक दवा प्राप्त होती है, जिसका उपयोग कैंसर के उपचार में किया जाता है।

13🐅 वन्य जीव संरक्षण और जैव-विविधता

वन्य जीवों का ह्रास

वनों के नष्ट होने और प्राकृतिक आवासों के सिकुड़ने से अनेक वन्य जीवों की संख्या घट रही है। इसके मुख्य कारण प्राकृतिक आवासों का विनाश, जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण, बड़े बाँध एवं औद्योगिक परियोजनाएँ, जल-वायु-मृदा प्रदूषण, अवैध शिकार और वन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हैं।

उदाहरण: गंगा नदी के प्रदूषण से गंगा डॉल्फिन के अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

IUCN द्वारा प्रजातियों का वर्गीकरण

IUCN: अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ।

सामान्य जातियाँ
जिनकी संख्या सामान्य है।
संकटग्रस्त जातियाँ
जिनके विलुप्त होने का खतरा अधिक है।
सुभेद्य जातियाँ
जिनकी संख्या लगातार घट रही है।
दुर्लभ जातियाँ
जिनकी संख्या बहुत कम है।
स्थानिक जातियाँ
जो केवल किसी विशेष क्षेत्र में पाई जाती हैं।
लुप्त जातियाँ
जो पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।

वन एवं वन्य जीव संरक्षण

रेड डेटा बुक: इसमें विलुप्त होने के खतरे वाली प्रजातियों की जानकारी दर्ज की जाती है।

① राष्ट्रीय उद्यान
वन्य जीवों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा की जाती है। खेती, लकड़ी काटना और पशुचारण सामान्यतः प्रतिबंधित होते हैं।
② अभयारण्य
वन्य जीवों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र। कुछ गतिविधियों की सीमित अनुमति हो सकती है।
③ जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
जैव-विविधता के संरक्षण के लिए बनाए गए बड़े क्षेत्र।

बाघ परियोजना

भारत में बाघों की घटती संख्या को बचाने के लिए 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया। प्रमुख बाघ क्षेत्र—कार्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, सारिस्का, मानस और पेरियार।

समुदाय और वन संरक्षण

चिपको आंदोलन: पेड़ों की कटाई रोकने के लिए स्थानीय लोगों ने पेड़ों से चिपककर उनका संरक्षण किया। इस आंदोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

संयुक्त वन प्रबंधन: वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण मिलकर खराब हो चुके वनों के संरक्षण और विकास का कार्य करते हैं।

जैव-विविधता

पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। भारत विश्व के समृद्ध जैव-विविधता वाले देशों में शामिल है।

महत्व: कृषि में नई और रोग-रोधी किस्मों के विकास, औषधियों के निर्माण, रबर-लकड़ी-रेशे जैसे संसाधनों की प्राप्ति तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में जैव-विविधता महत्वपूर्ण है।

उदाहरण: मार्फीन — पापावर पौधे से; क्यूनाईन — चिनचोना पौधे से; टेक्सोल — यव वृक्ष से।

जैव अपहरण (Bio Piracy)

प्राकृतिक जैव संपदा तथा उसके आनुवंशिक गुणों का बिना उचित अनुमति और लाभ-साझेदारी के व्यावसायिक उपयोग करना जैव अपहरण कहलाता है।

वन्य जीव संरक्षण के कानूनी प्रावधान

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972; वन संरक्षण अधिनियम, 1980; जैव विविधता अधिनियम, 2002; रामसर कन्वेंशन — आर्द्रभूमि संरक्षण।

14⛏️ खनिज संसाधन

खनिज — परिचय

खनिज आधुनिक सभ्यता और औद्योगिक विकास की आधारशिला हैं। खनिज ऐसा प्राकृतिक ठोस पदार्थ है जो निश्चित रासायनिक गुणों और आंतरिक संरचना के साथ पृथ्वी में पाया जाता है। पृथ्वी की ऊपरी परत चट्टानों से बनी है और चट्टानें विभिन्न खनिजों के मेल से बनती हैं। 2000 से अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है, लेकिन लगभग 30 खनिज आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

खनिजों के प्रकार

① धात्विक खनिज
जिनसे धातु प्राप्त की जा सकती है। लौहयुक्त: लौह अयस्क, मैंगनीज, निकिल, टंगस्टन। अलौह: सोना, चाँदी, बॉक्साइट, तांबा।
② अधात्विक खनिज
जिनसे धातु प्राप्त नहीं होती। कार्बनिक: कोयला, पेट्रोलियम। अकार्बनिक: अभ्रक, ग्रेफाइट।

प्रमुख विशेषताएँ और वितरण

खनिजों का वितरण पूरे भारत में समान नहीं है। अधिकांश खनिज प्राचीन चट्टानों में पाए जाते हैं। उत्तरी मैदान में मोटी जलोढ़ परत के कारण खनिज अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं और इनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं।

① उत्तर-पूर्वी पठार
छोटानागपुर, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वी आंध्रप्रदेश। प्रमुख खनिज—लौह अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम, थोरियम, क्रोमियम और चूना-पत्थर।
② दक्षिण-पश्चिम पठार
कर्नाटक और तमिलनाडु के पठारी क्षेत्र। प्रमुख खनिज—लौह अयस्क, मैंगनीज और बॉक्साइट।
③ उत्तर-पश्चिम प्रदेश
खंभात की खाड़ी से अरावली पर्वत तक का क्षेत्र। प्रमुख खनिज—चाँदी, सीसा, जस्ता, तांबा, जिप्सम, नमक और संगमरमर।

लौह-अयस्क

लोहा आधुनिक सभ्यता और उद्योगों का महत्वपूर्ण आधार है। खान से लोहा शुद्ध रूप में नहीं, बल्कि लौह अयस्क के रूप में प्राप्त होता है।

प्रकारलगभग लौह अंश
हेमाटाइट68%
मैग्नेटाइट60%
लिमोनाइट40%

प्रमुख उत्पादक राज्य: कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडिशा, गोवा और झारखंड।

मैंगनीज

भारत मैंगनीज उत्पादन में विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है। इसका उपयोग इस्पात निर्माण, मिश्र धातु, सूखी बैटरी, पेंट, माचिस, चमड़ा उद्योग, कीटनाशक एवं अन्य रासायनिक उद्योगों में होता है।

💡 महत्वपूर्ण: लगभग 1 टन इस्पात बनाने में करीब 10 किग्रा मैंगनीज का उपयोग होता है।

प्रमुख उत्पादक राज्य: ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश।

बॉक्साइट

बॉक्साइट वह प्रमुख खनिज है जिससे एल्युमिनियम प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग वायुयान निर्माण, बिजली के उपकरण, घरेलू बर्तन और रासायनिक उद्योग में होता है। प्रमुख उत्पादक राज्य—ओडिशा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़।

तांबा

तांबा बिजली का अच्छा चालक है। इसलिए इसका प्रमुख उपयोग बिजली के तार और विद्युत उपकरण बनाने में होता है। अन्य उपयोगों में बर्तन, सिक्के और विभिन्न औद्योगिक उपकरण शामिल हैं। प्रमुख क्षेत्र—झारखंड का सिंहभूम, राजस्थान का खेतड़ी-सिंघाना, मध्यप्रदेश का बालाघाट, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक।

अभ्रक (Mica)

अभ्रक बिजली का कुचालक है और उच्च तापमान सहन कर सकता है। इसलिए इसका उपयोग विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में किया जाता है। प्रमुख क्षेत्र बिहार-झारखंड, आंध्रप्रदेश का नेल्लोर और राजस्थान हैं।

💡 महत्वपूर्ण: बिहार-झारखंड क्षेत्र अभ्रक उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

चूना-पत्थर

चूना-पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इसका उपयोग सीमेंट, लौह-इस्पात, रसायन, उर्वरक, कागज और चीनी उद्योग में होता है। प्रमुख उत्पादक राज्य—मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार और झारखंड।

खनिजों का संरक्षण

खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। अत्यधिक दोहन पर नियंत्रण, बचत के साथ उपयोग, वैकल्पिक संसाधनों की खोज, खनिज अपशिष्ट का उपयोग और पुरानी धातुओं का पुनर्चक्रण प्रमुख उपाय हैं।

♻️ पुनर्चक्रण: पुरानी लोहे की मशीनों, कारों और पाइपों को पिघलाकर नई वस्तुएँ बनाना खनिजों के संरक्षण का अच्छा उपाय है।

15⚡ शक्ति (ऊर्जा) संसाधन

शक्ति संसाधन — परिचय

शक्ति (ऊर्जा) के साधनों का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ। आज ऊर्जा के स्रोत किसी भी देश के आर्थिक विकास और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

💡 महत्वपूर्ण: शक्ति संसाधन किसी राष्ट्र के विकास और औद्योगिक प्रगति की आधारशिला हैं।

शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण

① उपयोग स्तर
सतत: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बहता जल, भू-तापीय ऊर्जा। समापनीय: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
② उपयोगिता
प्राथमिक: प्रकृति से सीधे प्राप्त—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस। गौण: किसी अन्य ऊर्जा को परिवर्तित करके प्राप्त—बिजली।
③ क्षयशील एवं अक्षयशील
क्षयशील: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, परमाणु खनिज। अक्षयशील: बहता जल, पवन, लहरें और सौर ऊर्जा।
④ संरचनात्मक गुण
जैविक: मनुष्य और पशुओं की शारीरिक शक्ति। अजैविक: जल, पवन, सौर ऊर्जा और ईंधन।
⑤ परंपरा
पारंपरिक: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस। गैर-पारंपरिक: सौर, पवन, ज्वारीय, परमाणु और भू-तापीय ऊर्जा।

कोयला

भारत में ऊर्जा का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण स्रोत कोयला है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन, उद्योग, लोहा-इस्पात निर्माण तथा विभिन्न घरेलू कार्यों में किया जाता है।

प्रकारकार्बनविशेषता
एंथ्रासाइट90% से अधिकसर्वोत्तम
बिटुमिनस70–90%भारत में प्रमुख
लिग्नाइट30–70%भूरा कोयला
पीट30% से कमनिम्न कोटि

वितरण: अधिकांश कोयला गोंडवाना समूह की चट्टानों में पाया जाता है। प्रमुख क्षेत्र—दामोदर घाटी, सोन नदी घाटी, महानदी घाटी और वर्धा-गोदावरी घाटी। प्रमुख राज्य—झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल।

पेट्रोलियम

पेट्रोलियम शक्ति के साधनों में अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से उपयोगी संसाधन है। यह मुख्यतः परतदार चट्टानों में पाया जाता है। इससे पेट्रोल, डीजल, किरासन तेल, चिकनाई का तेल, प्लास्टिक, कृत्रिम रेशा, साबुन और कीटनाशक आदि प्राप्त होते हैं।

भारत में पहला तेल कुआँ: 1866 में ऊपरी असम घाटी में। प्रमुख तेल क्षेत्र: डिगबोई-असम, गुजरात के अंकलेश्वर-कलोल-नवगाँव-मेहसाना, मुम्बई हाई, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी क्षेत्र तथा बाड़मेर बेसिन।

💡 महत्वपूर्ण: भारत का पहला तेल शोधक कारखाना 1901 में डिगबोई (असम) में स्थापित हुआ था।

प्राकृतिक गैस

प्राकृतिक गैस सामान्यतः पेट्रोलियम के साथ पाई जाती है। इसका उपयोग खाना पकाने, उद्योगों, बिजली उत्पादन और वाहनों में CNG के रूप में होता है। प्रमुख क्षेत्र—असम, गुजरात, मुम्बई हाई, त्रिपुरा और कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र।

जल विद्युत

जल विद्युत बहते या गिरते जल की शक्ति से उत्पन्न बिजली है। यह नवीकरणीय और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। इसके लिए पर्याप्त जल, ढलान, तेज गति, ऊँचाई का अंतर, पूँजी और तकनीकी ज्ञान आवश्यक हैं।

💡 महत्वपूर्ण: भारत का पहला जल विद्युत केंद्र 1902 में शिवसमुद्रम (कर्नाटक) में स्थापित हुआ था।

प्रमुख परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल—सतलज; दामोदर घाटी—दामोदर; कोसी—कोसी; हीराकुंड—महानदी; रिहन्द—रिहन्द; तुंगभद्रा—तुंगभद्रा।

ताप विद्युत

ताप विद्युत संयंत्रों में कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस जलाकर भाप बनाई जाती है। भाप से टरबाइन घुमाकर बिजली उत्पन्न की जाती है। प्रमुख केंद्र—बोकारो, चंद्रपुरा, दुर्गापुर, कहलगाँव, बरौनी, कोरबा, सिंगरौली, रामागुंडम, फरक्का, तालचर, पतरातू और दादरी।

परमाणु ऊर्जा

परमाणु ऊर्जा मुख्यतः यूरेनियम और थोरियम जैसे खनिजों से प्राप्त होती है। परमाणु विखंडन से उत्पन्न ऊष्मा द्वारा भाप बनाई जाती है और बिजली उत्पन्न की जाती है। यूरेनियम का प्रमुख क्षेत्र जादूगोड़ा, झारखंड है। प्रमुख परमाणु विद्युत गृह—तारापुर, कलपक्कम, नरोरा, काकरापारा, कैगा और राणाप्रताप सागर।

सौर ऊर्जा

सोलर सेल सूर्य की किरणों को सीधे बिजली में बदलते हैं। सौर ऊर्जा स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। इसका उपयोग प्रकाश व्यवस्था, सौर हीटर, सिंचाई पंप और सौर लालटेन में होता है। सर्वाधिक संभावना राजस्थान और गुजरात में है।

पवन ऊर्जा

पवन चक्की हवा की गति को यांत्रिक ऊर्जा और फिर विद्युत ऊर्जा में बदलती है। अनुकूल राज्य राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक हैं। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पवन ऊर्जा की बड़ी संभावनाएँ हैं।

ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा

समुद्र के ज्वार-भाटे और लहरों में मौजूद ऊर्जा से बिजली उत्पन्न की जा सकती है। प्रमुख क्षेत्र—खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और सुंदरवन क्षेत्र।

भू-तापीय ऊर्जा

पृथ्वी के अंदर की गर्मी से प्राप्त ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। प्रमुख क्षेत्र—मनीकरण, हिमाचल प्रदेश और दुर्गा घाटी, लद्दाख।

बायोगैस एवं जैव ऊर्जा

पशुओं के गोबर और जैविक कचरे से बायोगैस बनाई जाती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती ऊर्जा मिलती है, बचा पदार्थ जैविक खाद के रूप में उपयोगी होता है और प्रदूषण में कमी आती है।

शक्ति संसाधनों का संरक्षण

अनावश्यक बिजली का उपयोग न करना, ऊर्जा की बचत करना, नए ऊर्जा स्रोतों की खोज, सौर-पवन-जैव-ज्वारीय ऊर्जा का विकास, वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना और ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना आवश्यक है।

16🎯 अभ्यास प्रश्न

💡 पहले स्वयं उत्तर सोचें — फिर प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें।
एक समय में केवल एक उत्तर खुलेगा। उत्तर छिपाने के लिए उसी प्रश्न पर दोबारा क्लिक करें।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर:वे वस्तुएँ जो मनुष्य की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक हों, संसाधन कहलाती हैं।
2“संसाधन होते नहीं; बनते हैं” कथन किसका है?
उत्तर:जिम्मरमैन का।
3संसाधनों का वितरण भारत में कैसा है?
उत्तर:संसाधनों का वितरण भारत में समान नहीं है।
4सतत् विकास क्या है?
उत्तर:ऐसा विकास जो वर्तमान की जरूरतें पूरी करे और भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को नुकसान न पहुँचाए।
5भूमि को सीमित संसाधन क्यों कहा जाता है?
उत्तर:क्योंकि भूमि का क्षेत्रफल सीमित है और इसे सामान्य रूप से बढ़ाया नहीं जा सकता।
6जलोढ़ मृदा के दो प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर:बांगर और खादर।
7काली मृदा का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:रेगुर या काली कपासी मृदा।
8काली मृदा की प्रमुख फसल कौन-सी है?
उत्तर:कपास।
9लैटेराइट मृदा से संबंधित प्रमुख प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:निक्षालन।
10उत्तर बिहार की बालू प्रधान जलोढ़ भूमि को क्या कहते हैं?
उत्तर:दियारा भूमि।
11भू-क्षरण क्या है?
उत्तर:मिट्टी का अपने स्थान से किसी कारण हट जाना भू-क्षरण कहलाता है।
12जल को नवीकरणीय संसाधन क्यों कहा जाता है?
उत्तर:जल का नवीनीकरण जलीय चक्र द्वारा लगातार होता रहता है।
13बहुउद्देशीय परियोजना क्या है?
उत्तर:ऐसी नदी-घाटी परियोजना जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करे।
14सोन परियोजना किस नदी से संबंधित है?
उत्तर:सोन नदी से।
15चिपको आंदोलन किससे संबंधित था?
उत्तर:पेड़ों की कटाई रोकने और वन संरक्षण से।
16IUCN का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ।
17प्रोजेक्ट टाइगर कब शुरू हुआ?
उत्तर:1973 में।
18बॉक्साइट से कौन-सी धातु प्राप्त होती है?
उत्तर:एल्युमिनियम।
19तांबा किसका अच्छा चालक है?
उत्तर:बिजली का।
20खनिज किस प्रकार के संसाधन हैं?
उत्तर:अनवीकरणीय संसाधन।
21भारत का पहला तेल शोधक कारखाना कहाँ था?
उत्तर:डिगबोई, असम में।
22भारत का पहला जल विद्युत केंद्र कहाँ स्थापित हुआ?
उत्तर:शिवसमुद्रम, कर्नाटक में।
23सौर ऊर्जा किस प्रकार की ऊर्जा है?
उत्तर:नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा।
24बायोगैस मुख्यतः किससे बनाई जाती है?
उत्तर:पशुओं के गोबर और जैविक कचरे से।
25पुनर्चक्रण खनिज संरक्षण में कैसे सहायक है?
उत्तर:पुरानी धातुओं को पुनः उपयोग करने से नए खनिजों के दोहन की आवश्यकता कम होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1संसाधन नियोजन के प्रमुख चरणों का वर्णन करें।
उत्तर:संसाधनों की पहचान के लिए सर्वेक्षण, मानचित्र तैयार करना, मात्रा और गुणवत्ता का आकलन, उचित तकनीक एवं कौशल की व्यवस्था तथा राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ तालमेल इसके प्रमुख चरण हैं।
2संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:संसाधनों के अत्यधिक दोहन से संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए वर्तमान आवश्यकताओं के साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचाना जरूरी है।
3बांगर और खादर में अंतर बताइए।
उत्तर:बांगर पुरानी जलोढ़ मिट्टी है जिसमें कंकड़ और बजरी अधिक होती है। खादर नई जलोढ़ मिट्टी है जिसमें बारीक कण और अधिक उपजाऊ मिट्टी होती है।
4मृदा निर्माण के प्रमुख कारक लिखिए।
उत्तर:धरातल की बनावट, मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, ह्यूमस, खनिज कण और समय मृदा निर्माण के प्रमुख कारक हैं।
5भू-क्षरण के प्राकृतिक और मानवीय कारण बताइए।
उत्तर:प्राकृतिक कारणों में तेज बहता पानी, पवन, हिमानी, समुद्री लहरें और गुरुत्व बल हैं। मानवीय कारणों में वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई, खनन और रसायनों का अत्यधिक उपयोग शामिल हैं।
6भारत में जल संकट के प्रमुख कारण क्या हैं?
उत्तर:जनसंख्या वृद्धि, उद्योग और शहरों का विस्तार, जल का असमान वितरण, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण तथा कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग प्रमुख कारण हैं।
7वर्षा जल संग्रहण का महत्व समझाइए।
उत्तर:इससे वर्षा के पानी को भविष्य के उपयोग के लिए बचाया जा सकता है तथा जमीन में पानी के रिसाव से भूमिगत जल की पुनर्पूर्ति में सहायता मिलती है।
8बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ और हानियाँ लिखिए।
उत्तर:लाभों में सिंचाई, जल-विद्युत, बाढ़ नियंत्रण और पेयजल शामिल हैं। हानियों में विस्थापन, नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा, तलछट और पर्यावरणीय प्रभाव शामिल हैं।
9वन्य जीवों के ह्रास के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:प्राकृतिक आवासों का विनाश, शहरीकरण, बड़े बाँध और औद्योगिक परियोजनाएँ, प्रदूषण, अवैध शिकार और वन संसाधनों का अत्यधिक दोहन प्रमुख कारण हैं।
10खनिज संरक्षण के प्रमुख उपाय बताइए।
उत्तर:अत्यधिक दोहन पर नियंत्रण, बचत के साथ उपयोग, वैकल्पिक संसाधनों की खोज, खनिज अपशिष्ट का उपयोग और पुरानी धातुओं का पुनर्चक्रण प्रमुख उपाय हैं।
11पारंपरिक और गैर-पारंपरिक ऊर्जा में अंतर बताइए।
उत्तर:कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पारंपरिक स्रोत हैं। सौर, पवन, ज्वारीय, जैव और भू-तापीय ऊर्जा गैर-पारंपरिक स्रोत हैं। गैर-पारंपरिक स्रोतों में अधिकांश नवीकरणीय हैं।
12सोन परियोजना का बिहार के लिए क्या महत्व है?
उत्तर:सोन परियोजना सिंचाई और कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। यह बिहार की प्रमुख और पुरानी नदी-घाटी परियोजनाओं में से एक है तथा इसके क्षेत्र को “बिहार का चावल का कटोरा” कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1संसाधन नियोजन, संरक्षण और सतत् विकास के संबंध को समझाइए।
उत्तर:

भारत में संसाधनों का वितरण समान नहीं है और कई संसाधन सीमित या अनवीकरणीय हैं। इसलिए संसाधनों की पहचान, मात्रा-गुणवत्ता का आकलन तथा उचित तकनीक के साथ उनका योजनाबद्ध उपयोग आवश्यक है।

अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ती हैं। संरक्षण से संसाधनों की उपलब्धता बनी रहती है और सतत् विकास वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के हितों की रक्षा करता है।

2भारत की प्रमुख मृदाओं की विशेषताएँ और कृषि महत्व लिखिए।
उत्तर:

भारत में जलोढ़, काली, लाल एवं पीली, लैटेराइट, मरुस्थलीय और पर्वतीय मृदा प्रमुख हैं। जलोढ़ मृदा कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। काली मृदा नमी रोकने की क्षमता और कपास के लिए प्रसिद्ध है। लाल एवं पीली मृदा में लौह तत्व के कारण लाल रंग दिखाई देता है।

लैटेराइट मृदा निक्षालन से संबंधित है और खाद-उर्वरक से खेती की जा सकती है। मरुस्थलीय मृदा शुष्क क्षेत्रों में तथा पर्वतीय मृदा पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।

3भारत में जल संकट के कारण तथा जल संरक्षण के उपायों की विवेचना करें।
उत्तर:

भारत में जल का वितरण असंतुलित है। जनसंख्या वृद्धि, उद्योग और शहरों का विस्तार, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण तथा जल का असमान उपयोग जल संकट को बढ़ाते हैं।

वर्षा जल संग्रहण, भूमिगत जल पुनर्पूर्ति, जल संभर प्रबंधन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जल प्रदूषण पर नियंत्रण तथा प्रदूषित जल का शोधन जल संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं।

4वन एवं वन्यजीव संरक्षण में समुदाय की भूमिका समझाइए।
उत्तर:

स्थानीय समुदाय वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चिपको आंदोलन में लोगों, विशेषकर महिलाओं ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए सक्रिय भागीदारी की। संयुक्त वन प्रबंधन में वन विभाग और ग्रामीण मिलकर वनों का संरक्षण करते हैं।

राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र संरक्षण के महत्वपूर्ण साधन हैं। प्रोजेक्ट टाइगर तथा संबंधित कानून भी वन्यजीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5भारत में खनिज और ऊर्जा संसाधनों के महत्व तथा संरक्षण के उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:

खनिज आधुनिक उद्योगों के लिए आवश्यक हैं। लौह अयस्क और मैंगनीज इस्पात उद्योग में, बॉक्साइट एल्युमिनियम के लिए, तांबा विद्युत उद्योग में तथा चूना-पत्थर सीमेंट उद्योग में उपयोगी हैं। ऊर्जा के लिए कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल विद्युत, परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा महत्वपूर्ण हैं।

खनिज अनवीकरणीय हैं, इसलिए उनका विवेकपूर्ण उपयोग, वैकल्पिक संसाधनों की खोज, अपशिष्ट का उपयोग और पुनर्चक्रण आवश्यक है। ऊर्जा संरक्षण के लिए ऊर्जा की बचत और नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देना चाहिए।

📚 Self Study Tip

अध्याय को पाँच बड़े हिस्सों में दोहराएँ—संसाधन एवं नियोजन, भूमि व मृदा, जल संसाधन, वन एवं वन्यजीव, तथा खनिज और ऊर्जा। पहले परिभाषाएँ और वर्गीकरण पढ़ें, फिर प्रमुख विशेषताएँ, स्थान, आँकड़े और परियोजनाएँ याद करें। अंत में अभ्यास प्रश्नों को बिना उत्तर देखे हल करें।

अध्याय का सार

संसाधन मानव जीवन और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। भूमि, मृदा, जल, वन, वन्यजीव, खनिज और ऊर्जा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका वितरण समान नहीं है और कई संसाधन सीमित या अनवीकरणीय हैं। इसलिए संसाधन नियोजन, संरक्षण और सतत् विकास आवश्यक है। जल एवं मृदा संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण, खनिजों का पुनर्चक्रण तथा नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार भविष्य के लिए सुरक्षित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

Comments

Popular posts from this blog

Economics Chapter 1: Economy and Its Development | Bihar Board Class 10 Notes

History Chapter 1: Nationalism in Europe | Bihar Board Class 10 Notes