Geography Chapter 1: Resources and Development | Bihar Board Class 10 Notes
अध्याय 1: संसाधन एवं उपयोग
संसाधन वे सभी वस्तुएँ हैं जो मनुष्य की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होती हैं। ये मुख्य रूप से भौतिक और जैविक संसाधन होते हैं।
भौतिक एवं जैविक पदार्थ तकनीक और ज्ञान के सहारे संसाधन बनते हैं। उदाहरण के लिए कोयला और पेट्रोलियम पृथ्वी में लाखों वर्षों से मौजूद थे, लेकिन उनका उपयोग करने की तकनीक विकसित होने के बाद ही वे उपयोगी संसाधन बने।
कवि की कविता, गायक की गायकी और चित्रकार की चित्रकारी भी संसाधन हैं, क्योंकि इनसे आजीविका प्राप्त होती है। मनुष्य स्वयं भी एक महत्वपूर्ण संसाधन है, क्योंकि उसके पास ज्ञान, कौशल और तकनीक होती है।
2संसाधनों का वर्गीकरण
संसाधनों को चार आधारों पर बाँटा जाता है—
3संसाधन नियोजन
संसाधन नियोजन का अर्थ है संसाधनों का सोच-समझकर और सही तरीके से उपयोग करना। भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का वितरण समान नहीं है। इसलिए संसाधन नियोजन बहुत आवश्यक है।
संसाधन नियोजन के प्रमुख चरण
4संसाधनों का संरक्षण
संसाधनों का संरक्षण का अर्थ है उनका सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करना, ताकि वे भविष्य के लिए भी सुरक्षित रहें।
संसाधनों के अत्यधिक दोहन से ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, अम्लीय वर्षा, मिट्टी का कटाव और अन्य पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
5सतत् विकास
सतत् विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो आज की जरूरतों को पूरा करे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की जरूरतें पूरी करने की क्षमता को नुकसान न पहुँचाए।
6🌱 भूमि संसाधन
भूमि वह आधार है जिस पर हम रहते हैं और अपनी सभी आर्थिक गतिविधियाँ करते हैं। कृषि, व्यापार, उद्योग आदि सभी कार्य भूमि पर ही किए जाते हैं। इसलिए भूमि सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है।
भूमि पर होने वाले मुख्य कार्य
भारत में भूमि का भौतिक स्वरूप
7🪨 मृदा — परिचय और निर्माण
पृथ्वी की सबसे ऊपरी पतली परत, जो टूटी-फूटी चट्टानों और जैव पदार्थों से मिलकर बनती है, मृदा कहलाती है। मृदा एक महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है।
मृदा पौधों को उगाने में सहायता करती है और जीव-जंतुओं के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मृदा बनने में बहुत लंबा समय लगता है, इसलिए इसका संरक्षण आवश्यक है।
मृदा निर्माण के प्रमुख कारक
धरातल की बनावट, मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, जैव पदार्थ या ह्यूमस, खनिज कण और समय।
भारत में मृदा के 6 प्रमुख प्रकार
नदियाँ पहाड़ों से मिट्टी बहाकर लाती हैं और मैदानों में जमा करती हैं। प्रमुख क्षेत्र उत्तर भारत का मैदान, सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र, राजस्थान और गुजरात के कुछ भाग तथा पूर्वी तटीय मैदान के नदी डेल्टा हैं।
विशेषताएँ: पोटाश, फास्फोरस और चूना अधिक; नाइट्रोजन और जैव पदार्थों की कमी; कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।
बांगर: पुरानी जलोढ़ मिट्टी, जिसमें कंकड़ और बजरी अधिक। खादर: नई जलोढ़ मिट्टी, जिसमें बारीक कण और अधिक उपजाऊ मिट्टी होती है।
मुख्य फसलें: गन्ना, चावल, गेहूँ, मक्का और दलहन।
काली कपासी मृदा या रेगुर भी कहा जाता है। इसका निर्माण मुख्यतः बेसाल्ट लावा और मूल चट्टानों के टूटने-गलने से हुआ है।
क्षेत्र: दक्कन का पठार, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ भाग। विशेषताएँ: नमी रोकने की क्षमता अधिक, कैल्शियम-मैग्नीशियम-पोटाश-चूना से भरपूर, फास्फोरस की कमी, गर्मियों में दरारें और गीली होने पर चिपचिपी।
मुख्य फसल: कपास; इसके अलावा गन्ना, प्याज, गेहूँ और फल।
ग्रेनाइट जैसी आग्नेय चट्टानों के टूटने और परिवर्तन से बनती है। लौह तत्व के कारण लाल तथा पानी मिलने पर पीली दिखाई दे सकती है।
क्षेत्र: तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छोटानागपुर और मेघालय पठार।
विशेषताएँ: ह्यूमस की कमी; अपेक्षाकृत कम उपजाऊ; खाद और उर्वरक से उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। फसलें: चावल, ज्वार-बाजरा, मक्का, मूँगफली और तंबाकू।
“LATER” शब्द का अर्थ ईंट बताया जाता है। यह मिट्टी सूखने पर ईंट की तरह कठोर हो जाती है। अधिक गर्मी और वर्षा में पोषक तत्व नीचे चले जाते हैं; इस प्रक्रिया को निक्षालन कहते हैं।
क्षेत्र: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम की पहाड़ियाँ। विशेषताएँ: लाल रंग, लौह और एल्युमीनियम ऑक्साइड, कम ह्यूमस। फसलें: चाय, कहवा और काजू।
कम वर्षा वाले बालू प्रधान क्षेत्रों में पाई जाती है। प्रमुख क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी पंजाब हैं। रंग लाल या हल्का भूरा, बालू अधिक तथा वनस्पति और उर्वरता कम होती है। सिंचाई से कपास, चावल और गेहूँ उगाए जा सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। नदी घाटियों में उपजाऊ जलोढ़ मृदा, ऊँचे भागों में मोटे कणों वाली मिट्टी और कुछ क्षेत्रों में अम्लीय मिट्टी मिलती है। प्रमुख फसलें सेब, नाशपाती, चावल और आलू हैं।
भूमि उपयोग
वन क्षेत्र, कृषि के लिए अनुपयुक्त बंजर भूमि, गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि, स्थायी चारागाह, बाग-बगीचे और उपवन, कृषि योग्य बंजर भूमि, वर्तमान परती भूमि, पुरानी परती भूमि तथा शुद्ध बोई गई भूमि भूमि उपयोग की प्रमुख श्रेणियाँ हैं।
प्रभावित करने वाले कारक: भौतिक—भूमि की बनावट, जलवायु और मिट्टी। मानवीय—जनसंख्या, तकनीक, संस्कृति और परंपरा।
भू-क्षरण और भू-निम्नीकरण
मिट्टी का अपने स्थान से किसी कारण से हट जाना भू-क्षरण कहलाता है। प्राकृतिक कारणों में तेज बहता पानी, आँधी-पवन, हिमानी, समुद्री लहरें और गुरुत्व बल हैं। मानवीय कारणों में वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई, खनन और रसायनों का अत्यधिक उपयोग हैं।
भू-संरक्षण
फसल-चक्रण, समोच्च जुताई, पट्टिका कृषि, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जैविक खाद तथा वृक्षारोपण भू-संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं।
8💧 जल संसाधन
जल — परिचय
जल जीवन का आधार है। पृथ्वी की सतह का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, इसलिए पृथ्वी को “नीला ग्रह (Blue Planet)” कहते हैं।
जल चक्र (Water Cycle): जल का नवीनीकरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है। इसलिए जल एक नवीकरणीय संसाधन है।
जीवों में जल का महत्व: जीव-जंतुओं में लगभग 65% जल होता है। पौधों में लगभग 65% से 99% तक जल होता है।
जल के स्रोत
भू-पृष्ठीय जल का निर्माण: वर्षा का कुछ जल वाष्प बनकर उड़ जाता है, कुछ जल जमीन में चला जाता है और शेष नदी-नालों तथा झीलों से होकर समुद्र में पहुँचता है।
विश्व में जल का वितरण
जल गोलार्द्ध: दक्षिणी गोलार्द्ध में जल की मात्रा अधिक है। स्थल गोलार्द्ध: उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की मात्रा अधिक है।
भारत में जल संसाधन का वितरण
भारत में जल संसाधनों का वितरण असंतुलित है।
| महत्वपूर्ण आँकड़ा | मात्रा |
|---|---|
| विश्व की जनसंख्या में भारत का हिस्सा | 16% |
| विश्व के मीठे जल में भारत का हिस्सा | 4% |
| वार्षिक वर्षा से प्राप्त जल | लगभग 4000 घन किमी |
| जमीन की सतह पर उपलब्ध जल | लगभग 1869 घन किमी |
| वास्तव में उपयोग हो पाने वाला जल | लगभग 690 अरब घन मीटर |
महत्वपूर्ण नदियाँ: गंगा द्रोणी में उपयोग योग्य जल भंडारण क्षमता सर्वाधिक है। ब्रह्मपुत्र का वार्षिक प्रवाह बहुत अधिक है, लेकिन उपयोग क्षमता कम है। ताप्ती में अनुपात की दृष्टि से उपयोग क्षमता बहुत अधिक है।
भूमिगत जल: भारत में भूमिगत जल का विशाल भंडार है। इसका बड़ा हिस्सा उत्तरी मैदान में उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल का महत्वपूर्ण हिस्सा पाया जाता है।
जल का उपयोग
पेयजल और घरेलू कार्य, कृषि और सिंचाई, उद्योग, जल-विद्युत उत्पादन, मछली पालन, जल-क्रीड़ा तथा परमाणु संयंत्रों को ठंडा करने में जल का उपयोग होता है। कृषि और सिंचाई में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है।
प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता
9🏗️ बहुउद्देशीय परियोजनाएँ
ऐसी नदी-घाटी परियोजना जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती है, बहुउद्देशीय परियोजना कहलाती है।
प्रमुख उद्देश्य
बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, जल-विद्युत उत्पादन, उद्योगों को जल उपलब्ध कराना, मछली पालन, पर्यटन तथा परिवहन और मनोरंजन।
प्रमुख परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर, गोदावरी, कृष्णा, स्वर्णरेखा और सोन परियोजना।
बहुउद्देशीय परियोजनाओं के नुकसान
नदी का प्राकृतिक बहाव रुकना, तलछट जमा होने से जलीय जीवों को नुकसान, कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की नई समस्या, लोगों का विस्थापन, कुछ क्षेत्रों में भूकंपीय जोखिम और अधिक सिंचाई से मिट्टी में लवणता बढ़ना इसके प्रमुख नुकसान हैं।
प्रमुख जनआंदोलन: नर्मदा बचाओ आंदोलन और टिहरी बाँध आंदोलन।
जल संकट
जब किसी व्यक्ति, क्षेत्र या देश को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता है, तो उसे जल संकट कहते हैं। इसके मुख्य कारण तेजी से बढ़ती जनसंख्या, उद्योगों और शहरों की वृद्धि, जल का असमान वितरण, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण, औद्योगिक कचरा और रसायन तथा कीटनाशक और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग हैं।
जल प्रदूषण के उदाहरण: बिहार और पश्चिम बंगाल में भूमिगत जल में आर्सेनिक की समस्या; राजस्थान और महाराष्ट्र में फ्लोराइड की समस्या; कानपुर के चमड़ा उद्योगों से गंगा में दूषित जल का प्रवाह।
10🌧️ जल संरक्षण एवं वर्षा जल संग्रहण
राष्ट्रीय जल नीति
सरकार ने सितंबर 1987 में राष्ट्रीय जल नीति बनाई, जिसे बाद में राष्ट्रीय जल नीति 2002 के रूप में संशोधित किया गया।
मुख्य सिद्धांत: जल की उपलब्धता बनाए रखना; जल को प्रदूषित होने से बचाना; प्रदूषित जल को साफ करके दोबारा उपयोग करना।
जल संरक्षण के प्रमुख उपाय
वर्षा जल संग्रहण
वर्षा के पानी को एकत्र करके उसका उपयोग करना वर्षा जल संग्रहण कहलाता है। यह जल संरक्षण की एक टिकाऊ और प्रभावी विधि है।
| क्षेत्र | परंपरागत प्रणाली / उपयोग |
|---|---|
| पश्चिमी हिमालय | गुल / कुल — खेतों की सिंचाई |
| राजस्थान | टाँका — पेयजल संग्रह |
| जैसलमेर | खादीन — खेती के लिए जल और नमी संरक्षण |
| राजस्थान के अन्य क्षेत्र | जोहड़ — जल संग्रहण |
| पश्चिम बंगाल | बाढ़ जल वाहिकाएँ — सिंचाई |
| मेघालय | छत पर वर्षा जल संग्रहण |
| कर्नाटक | मैसूर के गंडाथूर गाँव में छत जल संग्रहण |
11🌾 सोन परियोजना — बिहार
सोन परियोजना बिहार की प्रमुख और पुरानी नदी-घाटी परियोजनाओं में से एक है।
| मुख्य तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| स्थापना | 1874 ई. |
| स्थान | डेहरी के समीप सोन नदी |
| नहर की कुल लंबाई | लगभग 130 किमी |
| सिंचित भूमि | लगभग 3 लाख हेक्टेयर |
| पश्चिमी भाग की बिजली | 6.6 मेगावाट |
| पूर्वी भाग की बिजली | 3.3 मेगावाट |
पूर्वी नहर: पटना, गया और औरंगाबाद। पश्चिमी नहर: भोजपुर, बक्सर, रोहतास और चौसा।
1968 ई.: डेहरी से लगभग 10 किमी दूर इंद्रपुरी में बाँध बनाकर परियोजना को बहुउद्देशीय रूप दिया गया।
बिहार की अन्य प्रमुख परियोजनाएँ: गंडक परियोजना, कोसी परियोजना, दुर्गावती जलाशय परियोजना, बागमती परियोजना, ऊपरी किऊल जलाशय परियोजना और बरनार जलाशय परियोजना।
12🌳 वन एवं वन्य प्राणी संसाधन
वन एवं वन्य प्राणी — परिचय
वन एवं वन्य प्राणी मानव जीवन के प्रमुख साथी हैं। वन केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वन पेड़-पौधों एवं झाड़ियों से ढके बड़े भू-भाग को कहते हैं। जो वन अपने आप उगते हैं वे प्राकृतिक वन तथा जो मनुष्य द्वारा लगाए जाते हैं वे मानव निर्मित वन (वानिकी) कहलाते हैं।
वनों का महत्व
भारत में वन क्षेत्र
भारत वन क्षेत्र की दृष्टि से विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है। 2011 में भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 21.05% वन क्षेत्र था। वर्तमान में लगभग 20.55% क्षेत्र में वन हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में लगभग 90.3% भूमि पर वन हैं। वनाच्छादित क्षेत्र की दृष्टि से मध्यप्रदेश प्रमुख राज्य है। पूर्वोत्तर भारत वन संपदा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
घनत्व के आधार पर वनों के प्रकार
प्रशासनिक दृष्टि से वनों का वर्गीकरण
महत्वपूर्ण: भारत के वनों का लगभग 54% आरक्षित, 29% रक्षित और 17% अवर्गीकृत वन बताया गया है।
बिहार में वन की स्थिति
झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में वन क्षेत्र काफी कम रह गया। बिहार में लगभग 7.1% भौगोलिक क्षेत्र में वन बताए गए हैं। पश्चिमी चंपारण, मुंगेर, बांका, जमुई, नवादा, गया, रोहतास, कैमूर और औरंगाबाद वन क्षेत्र की दृष्टि से प्रमुख जिले हैं।
वन ह्रास के प्रमुख कारण
कृषि भूमि का विस्तार, झूम खेती, नदी घाटी एवं बहुउद्देशीय परियोजनाएँ, खनन कार्य, एकल वृक्षारोपण, पशुचारण, ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई, नगरीकरण और औद्योगीकरण वन ह्रास के प्रमुख कारण हैं।
13🐅 वन्य जीव संरक्षण और जैव-विविधता
वन्य जीवों का ह्रास
वनों के नष्ट होने और प्राकृतिक आवासों के सिकुड़ने से अनेक वन्य जीवों की संख्या घट रही है। इसके मुख्य कारण प्राकृतिक आवासों का विनाश, जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण, बड़े बाँध एवं औद्योगिक परियोजनाएँ, जल-वायु-मृदा प्रदूषण, अवैध शिकार और वन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हैं।
उदाहरण: गंगा नदी के प्रदूषण से गंगा डॉल्फिन के अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
IUCN द्वारा प्रजातियों का वर्गीकरण
IUCN: अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ।
वन एवं वन्य जीव संरक्षण
रेड डेटा बुक: इसमें विलुप्त होने के खतरे वाली प्रजातियों की जानकारी दर्ज की जाती है।
बाघ परियोजना
भारत में बाघों की घटती संख्या को बचाने के लिए 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया। प्रमुख बाघ क्षेत्र—कार्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, सारिस्का, मानस और पेरियार।
समुदाय और वन संरक्षण
चिपको आंदोलन: पेड़ों की कटाई रोकने के लिए स्थानीय लोगों ने पेड़ों से चिपककर उनका संरक्षण किया। इस आंदोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
संयुक्त वन प्रबंधन: वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण मिलकर खराब हो चुके वनों के संरक्षण और विकास का कार्य करते हैं।
जैव-विविधता
पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। भारत विश्व के समृद्ध जैव-विविधता वाले देशों में शामिल है।
महत्व: कृषि में नई और रोग-रोधी किस्मों के विकास, औषधियों के निर्माण, रबर-लकड़ी-रेशे जैसे संसाधनों की प्राप्ति तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में जैव-विविधता महत्वपूर्ण है।
उदाहरण: मार्फीन — पापावर पौधे से; क्यूनाईन — चिनचोना पौधे से; टेक्सोल — यव वृक्ष से।
जैव अपहरण (Bio Piracy)
प्राकृतिक जैव संपदा तथा उसके आनुवंशिक गुणों का बिना उचित अनुमति और लाभ-साझेदारी के व्यावसायिक उपयोग करना जैव अपहरण कहलाता है।
वन्य जीव संरक्षण के कानूनी प्रावधान
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972; वन संरक्षण अधिनियम, 1980; जैव विविधता अधिनियम, 2002; रामसर कन्वेंशन — आर्द्रभूमि संरक्षण।
14⛏️ खनिज संसाधन
खनिज — परिचय
खनिज आधुनिक सभ्यता और औद्योगिक विकास की आधारशिला हैं। खनिज ऐसा प्राकृतिक ठोस पदार्थ है जो निश्चित रासायनिक गुणों और आंतरिक संरचना के साथ पृथ्वी में पाया जाता है। पृथ्वी की ऊपरी परत चट्टानों से बनी है और चट्टानें विभिन्न खनिजों के मेल से बनती हैं। 2000 से अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है, लेकिन लगभग 30 खनिज आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
खनिजों के प्रकार
प्रमुख विशेषताएँ और वितरण
खनिजों का वितरण पूरे भारत में समान नहीं है। अधिकांश खनिज प्राचीन चट्टानों में पाए जाते हैं। उत्तरी मैदान में मोटी जलोढ़ परत के कारण खनिज अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं और इनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं।
लौह-अयस्क
लोहा आधुनिक सभ्यता और उद्योगों का महत्वपूर्ण आधार है। खान से लोहा शुद्ध रूप में नहीं, बल्कि लौह अयस्क के रूप में प्राप्त होता है।
| प्रकार | लगभग लौह अंश |
|---|---|
| हेमाटाइट | 68% |
| मैग्नेटाइट | 60% |
| लिमोनाइट | 40% |
प्रमुख उत्पादक राज्य: कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडिशा, गोवा और झारखंड।
मैंगनीज
भारत मैंगनीज उत्पादन में विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है। इसका उपयोग इस्पात निर्माण, मिश्र धातु, सूखी बैटरी, पेंट, माचिस, चमड़ा उद्योग, कीटनाशक एवं अन्य रासायनिक उद्योगों में होता है।
प्रमुख उत्पादक राज्य: ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश।
बॉक्साइट
बॉक्साइट वह प्रमुख खनिज है जिससे एल्युमिनियम प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग वायुयान निर्माण, बिजली के उपकरण, घरेलू बर्तन और रासायनिक उद्योग में होता है। प्रमुख उत्पादक राज्य—ओडिशा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़।
तांबा
तांबा बिजली का अच्छा चालक है। इसलिए इसका प्रमुख उपयोग बिजली के तार और विद्युत उपकरण बनाने में होता है। अन्य उपयोगों में बर्तन, सिक्के और विभिन्न औद्योगिक उपकरण शामिल हैं। प्रमुख क्षेत्र—झारखंड का सिंहभूम, राजस्थान का खेतड़ी-सिंघाना, मध्यप्रदेश का बालाघाट, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक।
अभ्रक (Mica)
अभ्रक बिजली का कुचालक है और उच्च तापमान सहन कर सकता है। इसलिए इसका उपयोग विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में किया जाता है। प्रमुख क्षेत्र बिहार-झारखंड, आंध्रप्रदेश का नेल्लोर और राजस्थान हैं।
चूना-पत्थर
चूना-पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इसका उपयोग सीमेंट, लौह-इस्पात, रसायन, उर्वरक, कागज और चीनी उद्योग में होता है। प्रमुख उत्पादक राज्य—मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार और झारखंड।
खनिजों का संरक्षण
खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। अत्यधिक दोहन पर नियंत्रण, बचत के साथ उपयोग, वैकल्पिक संसाधनों की खोज, खनिज अपशिष्ट का उपयोग और पुरानी धातुओं का पुनर्चक्रण प्रमुख उपाय हैं।
15⚡ शक्ति (ऊर्जा) संसाधन
शक्ति संसाधन — परिचय
शक्ति (ऊर्जा) के साधनों का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के साथ शुरू हुआ। आज ऊर्जा के स्रोत किसी भी देश के आर्थिक विकास और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण
कोयला
भारत में ऊर्जा का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण स्रोत कोयला है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन, उद्योग, लोहा-इस्पात निर्माण तथा विभिन्न घरेलू कार्यों में किया जाता है।
| प्रकार | कार्बन | विशेषता |
|---|---|---|
| एंथ्रासाइट | 90% से अधिक | सर्वोत्तम |
| बिटुमिनस | 70–90% | भारत में प्रमुख |
| लिग्नाइट | 30–70% | भूरा कोयला |
| पीट | 30% से कम | निम्न कोटि |
वितरण: अधिकांश कोयला गोंडवाना समूह की चट्टानों में पाया जाता है। प्रमुख क्षेत्र—दामोदर घाटी, सोन नदी घाटी, महानदी घाटी और वर्धा-गोदावरी घाटी। प्रमुख राज्य—झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल।
पेट्रोलियम
पेट्रोलियम शक्ति के साधनों में अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से उपयोगी संसाधन है। यह मुख्यतः परतदार चट्टानों में पाया जाता है। इससे पेट्रोल, डीजल, किरासन तेल, चिकनाई का तेल, प्लास्टिक, कृत्रिम रेशा, साबुन और कीटनाशक आदि प्राप्त होते हैं।
भारत में पहला तेल कुआँ: 1866 में ऊपरी असम घाटी में। प्रमुख तेल क्षेत्र: डिगबोई-असम, गुजरात के अंकलेश्वर-कलोल-नवगाँव-मेहसाना, मुम्बई हाई, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी क्षेत्र तथा बाड़मेर बेसिन।
प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस सामान्यतः पेट्रोलियम के साथ पाई जाती है। इसका उपयोग खाना पकाने, उद्योगों, बिजली उत्पादन और वाहनों में CNG के रूप में होता है। प्रमुख क्षेत्र—असम, गुजरात, मुम्बई हाई, त्रिपुरा और कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र।
जल विद्युत
जल विद्युत बहते या गिरते जल की शक्ति से उत्पन्न बिजली है। यह नवीकरणीय और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। इसके लिए पर्याप्त जल, ढलान, तेज गति, ऊँचाई का अंतर, पूँजी और तकनीकी ज्ञान आवश्यक हैं।
प्रमुख परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल—सतलज; दामोदर घाटी—दामोदर; कोसी—कोसी; हीराकुंड—महानदी; रिहन्द—रिहन्द; तुंगभद्रा—तुंगभद्रा।
ताप विद्युत
ताप विद्युत संयंत्रों में कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस जलाकर भाप बनाई जाती है। भाप से टरबाइन घुमाकर बिजली उत्पन्न की जाती है। प्रमुख केंद्र—बोकारो, चंद्रपुरा, दुर्गापुर, कहलगाँव, बरौनी, कोरबा, सिंगरौली, रामागुंडम, फरक्का, तालचर, पतरातू और दादरी।
परमाणु ऊर्जा
परमाणु ऊर्जा मुख्यतः यूरेनियम और थोरियम जैसे खनिजों से प्राप्त होती है। परमाणु विखंडन से उत्पन्न ऊष्मा द्वारा भाप बनाई जाती है और बिजली उत्पन्न की जाती है। यूरेनियम का प्रमुख क्षेत्र जादूगोड़ा, झारखंड है। प्रमुख परमाणु विद्युत गृह—तारापुर, कलपक्कम, नरोरा, काकरापारा, कैगा और राणाप्रताप सागर।
सौर ऊर्जा
सोलर सेल सूर्य की किरणों को सीधे बिजली में बदलते हैं। सौर ऊर्जा स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। इसका उपयोग प्रकाश व्यवस्था, सौर हीटर, सिंचाई पंप और सौर लालटेन में होता है। सर्वाधिक संभावना राजस्थान और गुजरात में है।
पवन ऊर्जा
पवन चक्की हवा की गति को यांत्रिक ऊर्जा और फिर विद्युत ऊर्जा में बदलती है। अनुकूल राज्य राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक हैं। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पवन ऊर्जा की बड़ी संभावनाएँ हैं।
ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा
समुद्र के ज्वार-भाटे और लहरों में मौजूद ऊर्जा से बिजली उत्पन्न की जा सकती है। प्रमुख क्षेत्र—खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और सुंदरवन क्षेत्र।
भू-तापीय ऊर्जा
पृथ्वी के अंदर की गर्मी से प्राप्त ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। प्रमुख क्षेत्र—मनीकरण, हिमाचल प्रदेश और दुर्गा घाटी, लद्दाख।
बायोगैस एवं जैव ऊर्जा
पशुओं के गोबर और जैविक कचरे से बायोगैस बनाई जाती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती ऊर्जा मिलती है, बचा पदार्थ जैविक खाद के रूप में उपयोगी होता है और प्रदूषण में कमी आती है।
शक्ति संसाधनों का संरक्षण
अनावश्यक बिजली का उपयोग न करना, ऊर्जा की बचत करना, नए ऊर्जा स्रोतों की खोज, सौर-पवन-जैव-ज्वारीय ऊर्जा का विकास, वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना और ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना आवश्यक है।
16🎯 अभ्यास प्रश्न
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
भारत में संसाधनों का वितरण समान नहीं है और कई संसाधन सीमित या अनवीकरणीय हैं। इसलिए संसाधनों की पहचान, मात्रा-गुणवत्ता का आकलन तथा उचित तकनीक के साथ उनका योजनाबद्ध उपयोग आवश्यक है।
अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ती हैं। संरक्षण से संसाधनों की उपलब्धता बनी रहती है और सतत् विकास वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के हितों की रक्षा करता है।
भारत में जलोढ़, काली, लाल एवं पीली, लैटेराइट, मरुस्थलीय और पर्वतीय मृदा प्रमुख हैं। जलोढ़ मृदा कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। काली मृदा नमी रोकने की क्षमता और कपास के लिए प्रसिद्ध है। लाल एवं पीली मृदा में लौह तत्व के कारण लाल रंग दिखाई देता है।
लैटेराइट मृदा निक्षालन से संबंधित है और खाद-उर्वरक से खेती की जा सकती है। मरुस्थलीय मृदा शुष्क क्षेत्रों में तथा पर्वतीय मृदा पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
भारत में जल का वितरण असंतुलित है। जनसंख्या वृद्धि, उद्योग और शहरों का विस्तार, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, जल प्रदूषण तथा जल का असमान उपयोग जल संकट को बढ़ाते हैं।
वर्षा जल संग्रहण, भूमिगत जल पुनर्पूर्ति, जल संभर प्रबंधन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जल प्रदूषण पर नियंत्रण तथा प्रदूषित जल का शोधन जल संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं।
स्थानीय समुदाय वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चिपको आंदोलन में लोगों, विशेषकर महिलाओं ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए सक्रिय भागीदारी की। संयुक्त वन प्रबंधन में वन विभाग और ग्रामीण मिलकर वनों का संरक्षण करते हैं।
राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र संरक्षण के महत्वपूर्ण साधन हैं। प्रोजेक्ट टाइगर तथा संबंधित कानून भी वन्यजीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
खनिज आधुनिक उद्योगों के लिए आवश्यक हैं। लौह अयस्क और मैंगनीज इस्पात उद्योग में, बॉक्साइट एल्युमिनियम के लिए, तांबा विद्युत उद्योग में तथा चूना-पत्थर सीमेंट उद्योग में उपयोगी हैं। ऊर्जा के लिए कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल विद्युत, परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा महत्वपूर्ण हैं।
खनिज अनवीकरणीय हैं, इसलिए उनका विवेकपूर्ण उपयोग, वैकल्पिक संसाधनों की खोज, अपशिष्ट का उपयोग और पुनर्चक्रण आवश्यक है। ऊर्जा संरक्षण के लिए ऊर्जा की बचत और नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देना चाहिए।
📚 Self Study Tip
अध्याय को पाँच बड़े हिस्सों में दोहराएँ—संसाधन एवं नियोजन, भूमि व मृदा, जल संसाधन, वन एवं वन्यजीव, तथा खनिज और ऊर्जा। पहले परिभाषाएँ और वर्गीकरण पढ़ें, फिर प्रमुख विशेषताएँ, स्थान, आँकड़े और परियोजनाएँ याद करें। अंत में अभ्यास प्रश्नों को बिना उत्तर देखे हल करें।
अध्याय का सार
संसाधन मानव जीवन और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। भूमि, मृदा, जल, वन, वन्यजीव, खनिज और ऊर्जा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका वितरण समान नहीं है और कई संसाधन सीमित या अनवीकरणीय हैं। इसलिए संसाधन नियोजन, संरक्षण और सतत् विकास आवश्यक है। जल एवं मृदा संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण, खनिजों का पुनर्चक्रण तथा नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार भविष्य के लिए सुरक्षित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
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